CSS 125अध्याय XI · Authorities, Assessment, Compliance and Recovery
धारा 125 · नियोक्ता से देय राशि का आकलन और निर्धारण।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा केंद्रीय बोर्ड या निगम के ऐसे अधिकारियों को, जो उस सरकार के समूह 'ए' अधिकारी के पद से नीचे के न हों, अध्याय III या अध्याय IV के प्रयोजनों के लिए अधिकृत अधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए अधिकृत कर सकती है, जो आदेश द्वारा---
(क) यदि किसी प्रतिष्ठान पर अध्याय III या अध्याय IV की प्रयोज्यता के संबंध में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो ऐसे विवाद का निर्णय करना; और
(ख) अध्याय III या अध्याय IV के किसी प्रावधान के तहत, जैसा भी मामला हो, या ऐसे अध्याय के तहत बनाई गई योजनाओं, नियमों, विनियमों के तहत किसी नियोक्ता से देय राशि का निर्धारण करना; और
(ग) खंड (क) और खंड (ख) से संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए, वह ऐसी जांच करे, जिसे वह ऐसे उद्देश्यों के लिए आवश्यक समझे:
बशर्ते कि इस उपधारा के अंतर्गत कोई भी कार्यवाही उस तिथि से पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद प्रारंभ नहीं की जाएगी जिस तिथि को खंड (क) में निर्दिष्ट विवाद उत्पन्न हुआ हो या, जैसा भी मामला हो, खंड (ख) में निर्दिष्ट राशि नियोक्ता से देय हो।
(2) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अंतर्गत जांच, जहां तक संभव हो, प्रतिदिन के आधार पर की जाएगी और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि जांच दो वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त हो जाए।
बशर्ते कि यदि उक्त दो वर्ष की अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं होती है, तो ऐसी जांच करने वाला अधिकृत अधिकारी जांच पूरी न होने के कारणों और परिस्थितियों को दर्ज करेगा और दर्ज की गई परिस्थितियों और कारणों को केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त या निगम के महानिदेशक, जैसा भी मामला हो, या इस संबंध में उनके द्वारा अधिकृत किसी अन्य अधिकारी को प्रस्तुत करेगा।
इसके अलावा, केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त या निगम के महानिदेशक, जैसा भी मामला हो, अधिकृत अधिकारी द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियों और कारणों पर विचार करने के बाद उक्त जांच को पूरा करने के लिए एक वर्ष तक की अवधि का विस्तार प्रदान कर सकते हैं।
इसके अलावा, इस संहिता के लागू होने की तिथि से ठीक पहले लंबित जांचों को अधिकृत अधिकारी द्वारा ऐसे लागू होने की तिथि से दो वर्ष से अधिक की अवधि के भीतर समाप्त कर दिया जाएगा।
(3) उपधारा (1) के तहत जांच करने वाले अधिकृत अधिकारी को ऐसी जांच के प्रयोजनों के लिए वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के तहत किसी न्यायालय को निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद की सुनवाई के लिए प्राप्त हैं, अर्थात्:---
(क) किसी व्यक्ति की उपस्थिति को लागू करना या उससे शपथ पर पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना; और
(घ) गवाहों की जांच के लिए आयोग जारी करना,
और ऐसी कोई भी जांच धारा 193 और 228 के अर्थ में तथा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी।
(4) उपधारा (1) के तहत कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा, जब तक कि संबंधित नियोक्ता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर न दिया जाए।
(5) यदि नियोक्ता, कर्मचारी या उपधारा (1) के अधीन जांच में उपस्थित होने के लिए बाध्य कोई अन्य व्यक्ति बिना कोई वैध कारण बताए ऐसी जांच में उपस्थित होने में विफल रहता है, या जांच करने वाले अधिकृत अधिकारी द्वारा ऐसा करने के लिए कहे जाने पर कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने या कोई रिपोर्ट या प्रतिलेख दाखिल करने में विफल रहता है, तो ऐसा जांच अधिकारी ऐसी जांच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्य और अभिलेख में उपलब्ध अन्य दस्तावेजों के आधार पर इस संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों की प्रयोज्यता का निर्णय कर सकता है या किसी नियोक्ता से देय राशि का निर्धारण कर सकता है।
(6) जहां उपधारा (1) के तहत किसी नियोक्ता के विरुद्ध एकतरफा आदेश पारित किया जाता है, तो वह ऐसे आदेश की सूचना मिलने की तिथि से तीन माह के भीतर ऐसे आदेश को रद्द करने के लिए अधिकृत अधिकारी को आवेदन कर सकता है और यदि अधिकृत अधिकारी संतुष्ट है कि कारण बताओ नोटिस विधिवत तामील नहीं किया गया था या ऐसे नियोक्ता को किसी पर्याप्त कारण से जांच के समय उपस्थित होने से रोका गया था, तो अधिकृत अधिकारी अपने पूर्ववर्ती आदेश को रद्द करने का आदेश देगा और जांच को आगे बढ़ाने के लिए एक तिथि नियुक्त करेगा।
बशर्ते कि ऐसा कोई आदेश केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जाएगा कि कारण बताओ नोटिस की तामील में कोई अनियमितता हुई है, यदि अधिकृत अधिकारी संतुष्ट है कि नियोक्ता को सुनवाई की तारीख की सूचना थी और उसे अधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था।
स्पष्टीकरण। ---जहां इस संहिता के अंतर्गत किसी एकतरफा पारित आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गई हो और ऐसी अपील का निपटारा इस आधार पर न किया गया हो कि अपीलकर्ता ने अपील वापस ले ली है, वहां एकतरफा आदेश को रद्द करने के लिए इस उपधारा के अंतर्गत कोई आवेदन नहीं किया जाएगा।
(7) इस धारा के तहत पारित कोई भी आदेश उपधारा (6) के तहत किसी आवेदन पर रद्द नहीं किया जाएगा, जब तक कि इसकी सूचना विपक्षी पक्ष को न दी गई हो।
(क) यदि किसी प्रतिष्ठान पर अध्याय III या अध्याय IV की प्रयोज्यता के संबंध में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो ऐसे विवाद का निर्णय करना; और
(ख) अध्याय III या अध्याय IV के किसी प्रावधान के तहत, जैसा भी मामला हो, या ऐसे अध्याय के तहत बनाई गई योजनाओं, नियमों, विनियमों के तहत किसी नियोक्ता से देय राशि का निर्धारण करना; और
(ग) खंड (क) और खंड (ख) से संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए, वह ऐसी जांच करे, जिसे वह ऐसे उद्देश्यों के लिए आवश्यक समझे:
बशर्ते कि इस उपधारा के अंतर्गत कोई भी कार्यवाही उस तिथि से पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद प्रारंभ नहीं की जाएगी जिस तिथि को खंड (क) में निर्दिष्ट विवाद उत्पन्न हुआ हो या, जैसा भी मामला हो, खंड (ख) में निर्दिष्ट राशि नियोक्ता से देय हो।
(2) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अंतर्गत जांच, जहां तक संभव हो, प्रतिदिन के आधार पर की जाएगी और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि जांच दो वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त हो जाए।
बशर्ते कि यदि उक्त दो वर्ष की अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं होती है, तो ऐसी जांच करने वाला अधिकृत अधिकारी जांच पूरी न होने के कारणों और परिस्थितियों को दर्ज करेगा और दर्ज की गई परिस्थितियों और कारणों को केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त या निगम के महानिदेशक, जैसा भी मामला हो, या इस संबंध में उनके द्वारा अधिकृत किसी अन्य अधिकारी को प्रस्तुत करेगा।
इसके अलावा, केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त या निगम के महानिदेशक, जैसा भी मामला हो, अधिकृत अधिकारी द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियों और कारणों पर विचार करने के बाद उक्त जांच को पूरा करने के लिए एक वर्ष तक की अवधि का विस्तार प्रदान कर सकते हैं।
इसके अलावा, इस संहिता के लागू होने की तिथि से ठीक पहले लंबित जांचों को अधिकृत अधिकारी द्वारा ऐसे लागू होने की तिथि से दो वर्ष से अधिक की अवधि के भीतर समाप्त कर दिया जाएगा।
(3) उपधारा (1) के तहत जांच करने वाले अधिकृत अधिकारी को ऐसी जांच के प्रयोजनों के लिए वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के तहत किसी न्यायालय को निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद की सुनवाई के लिए प्राप्त हैं, अर्थात्:---
(क) किसी व्यक्ति की उपस्थिति को लागू करना या उससे शपथ पर पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना; और
(घ) गवाहों की जांच के लिए आयोग जारी करना,
और ऐसी कोई भी जांच धारा 193 और 228 के अर्थ में तथा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी।
(4) उपधारा (1) के तहत कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा, जब तक कि संबंधित नियोक्ता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर न दिया जाए।
(5) यदि नियोक्ता, कर्मचारी या उपधारा (1) के अधीन जांच में उपस्थित होने के लिए बाध्य कोई अन्य व्यक्ति बिना कोई वैध कारण बताए ऐसी जांच में उपस्थित होने में विफल रहता है, या जांच करने वाले अधिकृत अधिकारी द्वारा ऐसा करने के लिए कहे जाने पर कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने या कोई रिपोर्ट या प्रतिलेख दाखिल करने में विफल रहता है, तो ऐसा जांच अधिकारी ऐसी जांच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्य और अभिलेख में उपलब्ध अन्य दस्तावेजों के आधार पर इस संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों की प्रयोज्यता का निर्णय कर सकता है या किसी नियोक्ता से देय राशि का निर्धारण कर सकता है।
(6) जहां उपधारा (1) के तहत किसी नियोक्ता के विरुद्ध एकतरफा आदेश पारित किया जाता है, तो वह ऐसे आदेश की सूचना मिलने की तिथि से तीन माह के भीतर ऐसे आदेश को रद्द करने के लिए अधिकृत अधिकारी को आवेदन कर सकता है और यदि अधिकृत अधिकारी संतुष्ट है कि कारण बताओ नोटिस विधिवत तामील नहीं किया गया था या ऐसे नियोक्ता को किसी पर्याप्त कारण से जांच के समय उपस्थित होने से रोका गया था, तो अधिकृत अधिकारी अपने पूर्ववर्ती आदेश को रद्द करने का आदेश देगा और जांच को आगे बढ़ाने के लिए एक तिथि नियुक्त करेगा।
बशर्ते कि ऐसा कोई आदेश केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जाएगा कि कारण बताओ नोटिस की तामील में कोई अनियमितता हुई है, यदि अधिकृत अधिकारी संतुष्ट है कि नियोक्ता को सुनवाई की तारीख की सूचना थी और उसे अधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था।
स्पष्टीकरण। ---जहां इस संहिता के अंतर्गत किसी एकतरफा पारित आदेश के विरुद्ध अपील दायर की गई हो और ऐसी अपील का निपटारा इस आधार पर न किया गया हो कि अपीलकर्ता ने अपील वापस ले ली है, वहां एकतरफा आदेश को रद्द करने के लिए इस उपधारा के अंतर्गत कोई आवेदन नहीं किया जाएगा।
(7) इस धारा के तहत पारित कोई भी आदेश उपधारा (6) के तहत किसी आवेदन पर रद्द नहीं किया जाएगा, जब तक कि इसकी सूचना विपक्षी पक्ष को न दी गई हो।
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