UP Police Regs 108अध्याय 10 · Reports Made at Police Stations
धारा 108 · पैरा-103. सूचनाओं को शुद्धता से लिखने और प्रतिहस्ताक्षरित करने का थाने के भारसाधक अधिकारी का दायित्व
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 और 155 (1) के द्वारा थाने के भारसाधक अधिकारी पर अपराध की चाहे संज्ञेय, हो या असंज्ञेय, सही रिपोर्ट लिखने का दायित्व प्रवर्तनीय होगा, और उसे अभिलिखित की गई दोनों प्रकार की रिपोर्ट पर प्रतिहस्ताक्षर करना चाहिये।
टिप्पणी
(1) रिपोर्ट के आवश्यक तत्व - धारा 154 के अधीन किसी इत्तिला के प्रथम इत्तिला रिपोर्ट होने के लिए यह आवश्यक है कि प्रथम तो वह इत्तिला संज्ञेय अपराध की हो दूसरे वह थाने के भारसाधक अधिकारी को दी गई हो। तीसरे वह या तो लिखित में प्रस्तुत की गई हो अथवा मौखिक होने की दशा में वह थाने के भार-साधक अधिकारी द्वारा लेखबद्ध की या कराई गई हो, चौथे उसका सार जनरल डायरी में अंकित किया गया हो। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार प्रथम इत्तिला रिपोर्ट पर वह समय भी अंकित किया जाना चाहिए जब वह थाने में प्रस्तुत की गई हो।
(2) दूरभाष द्वारा इत्तिला - किसी इत्तिला के प्रथम इत्तिला रिपोर्ट होने के लिए यह आवश्यक है कि वह संज्ञेय अपराध की इत्तिला हो। यदि दूरभाष (टेलीफोन) द्वारा कोई गुमनाम व्यक्ति पुलिस को यह सूचित करे कि किसी स्थान पर गोली चल रही है तो वह प्रथम इत्तिला रिपोर्ट नहीं मानी जा सकती है। तथापि दूरभाष (टेलीफोन) द्वारा संज्ञेय अपराध की दी गई प्रथम इत्तिला, प्रथम इत्तिला रिपोर्ट मानी जा सकती है। परन्तु एक अन्य मामले में जहाँ दूरभाष से प्राप्त इत्तिला को अभिलिखित किया गया था तो उसे प्रथम इत्तिला नहीं माना गया।
(3) दूरलेख (तार) द्वारा इत्तिला - किसी थाने के भारसाधक अधिकारी को दूरलेख (तार) द्वारा भी संज्ञेय अपराध की इत्तिला दी जा सकती है, परन्तु जब तक उस इत्तिला को देने वाले व्यक्ति द्वारा साक्षात में प्रमाणीकरण न कर दिया जावे, वह प्रथम इत्तिला रिपोर्ट की परिभाषा में नहीं आयेगी
(4) अभियुक्त द्वारा प्रथम इत्तिला - ऐसी भी स्थिति हो सकती है कि प्रथम इत्तिला रिपोर्ट अभियुक्त द्वारा की जावे और उसमें अभियुक्त द्वारा अपने दोष को स्वीकार भी किया गया हो। ऐसी स्थिति में अपराध की संस्वीकृति इण्डियन एवीडेन्स एक्ट की धारा 25 के अनुसार साक्ष्य में ग्रहण योग्य न होगी, परन्तु अन्य तथ्य तथा उक्त अधिनियम की धारा 27 के अधीन आने वाले संगत तथ्य साक्ष्य में ग्रहण किए जा सकते हैं। परन्तु ऐसी रिपोर्ट का उपयोग अभियुक्त के पक्ष में किया जा सकता है। 8 अन्वेषण के दौरान अभियुक्त द्वारा दिये गये कथन को किसी भी दशा में प्रथम इत्तिला रिपोर्ट नहीं माना जा सकता। इस धारा के अधीन अभियुक्त द्वारा दी गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का उपयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 21 के अधीन स्वीकृति के रूप में करने के लिए सम्पूर्ण रिपोर्ट पर पूर्णरूपेण विचार करना चाहिए न कि आंशिक रूप में। 10 यदि एक अभियुक्त ने किसी सह अभियुक्त के विरुद्ध रिपोर्ट दी हो तो वह ऐसे अभियुक्त के विरुद्ध प्रयोग नहीं की जा सकती। निसार अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ।
(5) प्रथम इत्तिला रिपोर्ट किसको दी जावेगी- जब किसी घटना की इत्तिला बीट चौकी के हवलदार को दी गई हो और वही इत्तिला बाद में थाने में दी जावे तो थाने में दी कई इत्तिला ही प्रथम इत्तिला मानी जावेगी, क्योंकि चौकी थाने की परिभाषा में नहीं आती। इसी प्रकार बीट चौकी पर दी गई इत्तिला रिपोर्ट नहीं होगी परन्तु यदि उसके आधार पर अन्वेषण की कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जावे तो धारा 154 के अनुरूप न होने पर भी उसे प्रथम इत्तिला रिपोर्ट माना जा सकता है।
इत्तिला उसी भाषा और शब्दावली में अंकित की जाना चाहिये, जिसमें वह पुलिस अधिकारी को दी गई हो ।
यदि इत्तिला लेखबद्ध किये जाते समय इत्तिला देने वाले ने उस पर हस्ताक्षर न किये हों, तो इस त्रुटि के कारण वह साक्ष्य में ग्रहण किये जाने के अयोग्य नहीं हो जावेगी। युद्यपि हस्ताक्षर न किया जाना इत्तिला की विश्वसनीयता को कम कर देता है, तथापि इत्तिला रिपोर्ट का स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता
(6) प्रथम इत्तिला रिपोर्ट अंकित किया जाना अनिवार्य है- जब कभी किसी संज्ञेय अपराध के गठित होने की इत्तिला पुलिस अधिकारी को दी जावे तो उसका लेखबद्ध किया जाना आवश्यक है। पुलिस अधिकारी उसकी सत्यता की प्रारम्भिक जाँच करने तक उसके लिखने को टाल नहीं सकता। यदि रिपोर्ट असत्य हो तो भी उसका अंकित किया जाना आवश्यक है।
पुलिस अधिकारी को चाहिये कि जब भी उसे किसी संज्ञेय अपराध की इत्तिला दी जावे वह तत्काल उसे वहीं पर ग्रहण करे।
(7) असंज्ञेय मामलों में पुलिस का कर्त्तव्य- पुलिस अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह असंज्ञेय मामले में भी इत्तिला का सार अंकित करे। यद्यपि वह बिना सक्षम मजिस्ट्रेट की आज्ञा के अन्वेषण प्रारम्भ नहीं कर सकता है। वह इत्तिला देने वाले को समक्ष मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही करने को निर्देशित कर सकता है अथवा मजिस्ट्रेट को इत्तिला का सार उचित आदेश हेतु स्वयं भी भेज सकता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट-कोई दुविधापूर्ण या अनिश्चित सूचना जो पुलिस को अन्वेषण आरम्भकरने के लिए बाध्य नहीं करती, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत सूचना नहीं होती। इस प्रकार, किसी पश्चात्वर्ती नियमित प्रथम सूचना रिपोर्ट को धारा 162 के अधीन अनुमन्य धारित नहीं किया जा सकता। पहले की डायरी प्रविष्टि को तलब नहीं किया गया, न ही उसकी कोई प्रमाणित प्रतिलिपि दाखिल की गयी। अन्वेषण अधिकारी से इन तथ्यों का पता नहीं लगाया गया कि इसका सम्बन्ध उसी घटना से है या किसी अन्य घटना से। अतः इसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप में स्वीकार नहीं किया - जा सकता और अभियोजन द्वारा इसको पेश न किए जाने से कोई प्रतिकूल अनुमान नहीं लगाया जा सकता।।
प्रथम सूचना रिपोर्ट का साक्ष्यिक मूल्यांकन - प्रथम सूचना रिपोर्ट सारभूत साक्ष्य नहीं है। उसमें सभी तथ्यों का विस्तृत ब्योरा आवश्यक नहीं है।
विचारण न्यायालय द्वारा साक्ष्य का गलत मूल्यांकन किये जाने पर अपील न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट मौखिक साक्ष्य नहीं है कहने का अभिप्राय है कि यह उन तथ्यों साक्ष्य नहीं है जो उसमें उल्लिखित किये गये हैं।
जहाँ पर प्रथम बार में यह परिकल्पित किया गया हो कि प्रथम सूचना रिपोर्ट को जानबूझ कर गढ़ा गया है या उसे घटना के घठित होने के काफी देर बाद अस्तित्व में लाया गया है तो वहां ऐसी सूचना को बल प्रदान करने के सम्बन्ध में अभियोजक की सारी बातें अस्वीकार कर दी जायेंगी।
प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति का प्रदान किया जाना - इस धारा की उपधारा 2 में यह अभिकथित किया गया है कि उप धारा के अधीन अभिलिखित इत्तिला की प्रतिलिपि सूचना देने वाले व्यक्ति को अविलम्ब बिना कोई शुल्क लिये प्रदान की जायेगी।
इसके अतिरिक्त जब अभियुक्त मजिस्ट्रेट से प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति की मांग करेगा तो मजिस्ट्रेट अभियुक्त को ऐसी प्रति देने के लिए बाध्य होगा क्योंकि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक लोक दस्तावेज है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट का विलम्ब से भेजा जाना - प्रथम सूचना रिपोर्ट का विलम्ब से भेजा जाना सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि मामला धारा 148/149/307, भा०दं०सं० के अधीन 3.25 अपराह्न में मृत्यु कालिक कथन के आधार पर दर्ज किया गया तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पास दूसरे दिन प्रातः 4 बजे भेजी गयी।
जब प्रथम सूचना रिपोर्ट 13-11-82 को दाखिल की गई, और अभियुक्त उपलब्ध होते हुए भी 4-12-82 के पूर्व गिरफ्तार नहीं किया गया तथा अन्वेषण अधिकारी इसका स्पष्टीकरण देने में असमर्थ रहा, तो यह सब बातें प्रथम सूचना रिपोर्ट की सत्यता तथा सम्पूर्ण अन्वेषण पर भीषण रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
घटना जिसके फलस्वरूप हत्या हुई लगभग 10-30 मिनट पर प्रातः हुई। पुलिस स्टेशन 10 कि०मी० दूर था। प्रथम सूचना रिपोर्ट 1 बजकर 45 मिनट पर लिखवाई गयी। इस प्रकार यह विलम्ब नहीं मानी जा सकती ।
टिप्पणी
(1) रिपोर्ट के आवश्यक तत्व - धारा 154 के अधीन किसी इत्तिला के प्रथम इत्तिला रिपोर्ट होने के लिए यह आवश्यक है कि प्रथम तो वह इत्तिला संज्ञेय अपराध की हो दूसरे वह थाने के भारसाधक अधिकारी को दी गई हो। तीसरे वह या तो लिखित में प्रस्तुत की गई हो अथवा मौखिक होने की दशा में वह थाने के भार-साधक अधिकारी द्वारा लेखबद्ध की या कराई गई हो, चौथे उसका सार जनरल डायरी में अंकित किया गया हो। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार प्रथम इत्तिला रिपोर्ट पर वह समय भी अंकित किया जाना चाहिए जब वह थाने में प्रस्तुत की गई हो।
(2) दूरभाष द्वारा इत्तिला - किसी इत्तिला के प्रथम इत्तिला रिपोर्ट होने के लिए यह आवश्यक है कि वह संज्ञेय अपराध की इत्तिला हो। यदि दूरभाष (टेलीफोन) द्वारा कोई गुमनाम व्यक्ति पुलिस को यह सूचित करे कि किसी स्थान पर गोली चल रही है तो वह प्रथम इत्तिला रिपोर्ट नहीं मानी जा सकती है। तथापि दूरभाष (टेलीफोन) द्वारा संज्ञेय अपराध की दी गई प्रथम इत्तिला, प्रथम इत्तिला रिपोर्ट मानी जा सकती है। परन्तु एक अन्य मामले में जहाँ दूरभाष से प्राप्त इत्तिला को अभिलिखित किया गया था तो उसे प्रथम इत्तिला नहीं माना गया।
(3) दूरलेख (तार) द्वारा इत्तिला - किसी थाने के भारसाधक अधिकारी को दूरलेख (तार) द्वारा भी संज्ञेय अपराध की इत्तिला दी जा सकती है, परन्तु जब तक उस इत्तिला को देने वाले व्यक्ति द्वारा साक्षात में प्रमाणीकरण न कर दिया जावे, वह प्रथम इत्तिला रिपोर्ट की परिभाषा में नहीं आयेगी
(4) अभियुक्त द्वारा प्रथम इत्तिला - ऐसी भी स्थिति हो सकती है कि प्रथम इत्तिला रिपोर्ट अभियुक्त द्वारा की जावे और उसमें अभियुक्त द्वारा अपने दोष को स्वीकार भी किया गया हो। ऐसी स्थिति में अपराध की संस्वीकृति इण्डियन एवीडेन्स एक्ट की धारा 25 के अनुसार साक्ष्य में ग्रहण योग्य न होगी, परन्तु अन्य तथ्य तथा उक्त अधिनियम की धारा 27 के अधीन आने वाले संगत तथ्य साक्ष्य में ग्रहण किए जा सकते हैं। परन्तु ऐसी रिपोर्ट का उपयोग अभियुक्त के पक्ष में किया जा सकता है। 8 अन्वेषण के दौरान अभियुक्त द्वारा दिये गये कथन को किसी भी दशा में प्रथम इत्तिला रिपोर्ट नहीं माना जा सकता। इस धारा के अधीन अभियुक्त द्वारा दी गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट का उपयोग साक्ष्य अधिनियम की धारा 21 के अधीन स्वीकृति के रूप में करने के लिए सम्पूर्ण रिपोर्ट पर पूर्णरूपेण विचार करना चाहिए न कि आंशिक रूप में। 10 यदि एक अभियुक्त ने किसी सह अभियुक्त के विरुद्ध रिपोर्ट दी हो तो वह ऐसे अभियुक्त के विरुद्ध प्रयोग नहीं की जा सकती। निसार अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ।
(5) प्रथम इत्तिला रिपोर्ट किसको दी जावेगी- जब किसी घटना की इत्तिला बीट चौकी के हवलदार को दी गई हो और वही इत्तिला बाद में थाने में दी जावे तो थाने में दी कई इत्तिला ही प्रथम इत्तिला मानी जावेगी, क्योंकि चौकी थाने की परिभाषा में नहीं आती। इसी प्रकार बीट चौकी पर दी गई इत्तिला रिपोर्ट नहीं होगी परन्तु यदि उसके आधार पर अन्वेषण की कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जावे तो धारा 154 के अनुरूप न होने पर भी उसे प्रथम इत्तिला रिपोर्ट माना जा सकता है।
इत्तिला उसी भाषा और शब्दावली में अंकित की जाना चाहिये, जिसमें वह पुलिस अधिकारी को दी गई हो ।
यदि इत्तिला लेखबद्ध किये जाते समय इत्तिला देने वाले ने उस पर हस्ताक्षर न किये हों, तो इस त्रुटि के कारण वह साक्ष्य में ग्रहण किये जाने के अयोग्य नहीं हो जावेगी। युद्यपि हस्ताक्षर न किया जाना इत्तिला की विश्वसनीयता को कम कर देता है, तथापि इत्तिला रिपोर्ट का स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता
(6) प्रथम इत्तिला रिपोर्ट अंकित किया जाना अनिवार्य है- जब कभी किसी संज्ञेय अपराध के गठित होने की इत्तिला पुलिस अधिकारी को दी जावे तो उसका लेखबद्ध किया जाना आवश्यक है। पुलिस अधिकारी उसकी सत्यता की प्रारम्भिक जाँच करने तक उसके लिखने को टाल नहीं सकता। यदि रिपोर्ट असत्य हो तो भी उसका अंकित किया जाना आवश्यक है।
पुलिस अधिकारी को चाहिये कि जब भी उसे किसी संज्ञेय अपराध की इत्तिला दी जावे वह तत्काल उसे वहीं पर ग्रहण करे।
(7) असंज्ञेय मामलों में पुलिस का कर्त्तव्य- पुलिस अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह असंज्ञेय मामले में भी इत्तिला का सार अंकित करे। यद्यपि वह बिना सक्षम मजिस्ट्रेट की आज्ञा के अन्वेषण प्रारम्भ नहीं कर सकता है। वह इत्तिला देने वाले को समक्ष मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही करने को निर्देशित कर सकता है अथवा मजिस्ट्रेट को इत्तिला का सार उचित आदेश हेतु स्वयं भी भेज सकता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट-कोई दुविधापूर्ण या अनिश्चित सूचना जो पुलिस को अन्वेषण आरम्भकरने के लिए बाध्य नहीं करती, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत सूचना नहीं होती। इस प्रकार, किसी पश्चात्वर्ती नियमित प्रथम सूचना रिपोर्ट को धारा 162 के अधीन अनुमन्य धारित नहीं किया जा सकता। पहले की डायरी प्रविष्टि को तलब नहीं किया गया, न ही उसकी कोई प्रमाणित प्रतिलिपि दाखिल की गयी। अन्वेषण अधिकारी से इन तथ्यों का पता नहीं लगाया गया कि इसका सम्बन्ध उसी घटना से है या किसी अन्य घटना से। अतः इसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप में स्वीकार नहीं किया - जा सकता और अभियोजन द्वारा इसको पेश न किए जाने से कोई प्रतिकूल अनुमान नहीं लगाया जा सकता।।
प्रथम सूचना रिपोर्ट का साक्ष्यिक मूल्यांकन - प्रथम सूचना रिपोर्ट सारभूत साक्ष्य नहीं है। उसमें सभी तथ्यों का विस्तृत ब्योरा आवश्यक नहीं है।
विचारण न्यायालय द्वारा साक्ष्य का गलत मूल्यांकन किये जाने पर अपील न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट मौखिक साक्ष्य नहीं है कहने का अभिप्राय है कि यह उन तथ्यों साक्ष्य नहीं है जो उसमें उल्लिखित किये गये हैं।
जहाँ पर प्रथम बार में यह परिकल्पित किया गया हो कि प्रथम सूचना रिपोर्ट को जानबूझ कर गढ़ा गया है या उसे घटना के घठित होने के काफी देर बाद अस्तित्व में लाया गया है तो वहां ऐसी सूचना को बल प्रदान करने के सम्बन्ध में अभियोजक की सारी बातें अस्वीकार कर दी जायेंगी।
प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति का प्रदान किया जाना - इस धारा की उपधारा 2 में यह अभिकथित किया गया है कि उप धारा के अधीन अभिलिखित इत्तिला की प्रतिलिपि सूचना देने वाले व्यक्ति को अविलम्ब बिना कोई शुल्क लिये प्रदान की जायेगी।
इसके अतिरिक्त जब अभियुक्त मजिस्ट्रेट से प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रति की मांग करेगा तो मजिस्ट्रेट अभियुक्त को ऐसी प्रति देने के लिए बाध्य होगा क्योंकि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक लोक दस्तावेज है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट का विलम्ब से भेजा जाना - प्रथम सूचना रिपोर्ट का विलम्ब से भेजा जाना सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि मामला धारा 148/149/307, भा०दं०सं० के अधीन 3.25 अपराह्न में मृत्यु कालिक कथन के आधार पर दर्ज किया गया तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पास दूसरे दिन प्रातः 4 बजे भेजी गयी।
जब प्रथम सूचना रिपोर्ट 13-11-82 को दाखिल की गई, और अभियुक्त उपलब्ध होते हुए भी 4-12-82 के पूर्व गिरफ्तार नहीं किया गया तथा अन्वेषण अधिकारी इसका स्पष्टीकरण देने में असमर्थ रहा, तो यह सब बातें प्रथम सूचना रिपोर्ट की सत्यता तथा सम्पूर्ण अन्वेषण पर भीषण रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
घटना जिसके फलस्वरूप हत्या हुई लगभग 10-30 मिनट पर प्रातः हुई। पुलिस स्टेशन 10 कि०मी० दूर था। प्रथम सूचना रिपोर्ट 1 बजकर 45 मिनट पर लिखवाई गयी। इस प्रकार यह विलम्ब नहीं मानी जा सकती ।
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