AT Act 22अध्याय IV · Procedure
धारा 22 · न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया और शक्तियां।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) न्यायाधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं होगा, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होगा और इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों और केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए किसी भी नियम के अधीन रहते हुए, न्यायाधिकरण को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी, जिसमें उसकी जांच के स्थान और समय का निर्धारण करना और यह तय करना शामिल है कि वह सार्वजनिक रूप से बैठेगा या निजी तौर पर।
(2) न्यायाधिकरण को उसके समक्ष किए गए प्रत्येक आवेदन पर यथाशीघ्र निर्णय लेना होगा और सामान्यतः प्रत्येक आवेदन पर दस्तावेजों और लिखित अभ्यावेदनों के अवलोकन के आधार पर और [ उपलब्ध मौखिक तर्कों को सुनने के बाद] निर्णय लिया जाएगा।
( 3 ) इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, न्यायाधिकरण को वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के तहत किसी सिविल न्यायालय को किसी मुकदमे की सुनवाई करते समय निम्नलिखित मामलों के संबंध में प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी व्यक्ति को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1 ऑफ 1872) की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की मांग करना;
(ई) गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(f) अपने निर्णयों की समीक्षा करना;
(जी) चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करना या उस पर एकतरफा निर्णय लेना;
(h) चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा एकतरफा पारित किसी आदेश को रद्द करना; और
(i) कोई अन्य मामला जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
(2) न्यायाधिकरण को उसके समक्ष किए गए प्रत्येक आवेदन पर यथाशीघ्र निर्णय लेना होगा और सामान्यतः प्रत्येक आवेदन पर दस्तावेजों और लिखित अभ्यावेदनों के अवलोकन के आधार पर और [ उपलब्ध मौखिक तर्कों को सुनने के बाद] निर्णय लिया जाएगा।
( 3 ) इस अधिनियम के तहत अपने कार्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, न्यायाधिकरण को वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के तहत किसी सिविल न्यायालय को किसी मुकदमे की सुनवाई करते समय निम्नलिखित मामलों के संबंध में प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी व्यक्ति को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1 ऑफ 1872) की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की मांग करना;
(ई) गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(f) अपने निर्णयों की समीक्षा करना;
(जी) चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करना या उस पर एकतरफा निर्णय लेना;
(h) चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा एकतरफा पारित किसी आदेश को रद्द करना; और
(i) कोई अन्य मामला जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।

