Wages Code 45अध्याय VI · Payment of Dues Claims and Audit
धारा 45 · संहिता के अंतर्गत दावे और उसकी प्रक्रिया।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) उपयुक्त सरकार अधिसूचना द्वारा, राजपत्रित अधिकारी के पद से नीचे के रैंक के न होने वाले एक या एक से अधिक अधिकारियों को इस संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत उत्पन्न होने वाले दावों की सुनवाई एवं निर्धारण करने के लिए नियुक्त कर सकती है।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी, उस उपधारा के अधीन दावे का निर्णय करते समय, उन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिनके अंतर्गत दावा उत्पन्न होता है, निर्धारित दावे के अतिरिक्त मुआवजे के भुगतान का आदेश दे सकता है, जो निर्धारित दावे के दस गुना तक हो सकता है, और प्राधिकारी द्वारा दावे का निर्णय तीन माह की अवधि के भीतर करने का प्रयास किया जाएगा।
(3) यदि कोई नियोक्ता उपधारा (2) के तहत निर्धारित दावा और भुगतान करने का आदेश दिया गया मुआवजा देने में विफल रहता है, तो प्राधिकरण उस जिले के कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को वसूली का प्रमाण पत्र जारी करेगा जहां प्रतिष्ठान स्थित है, जो इसे भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल करेगा और संबंधित कर्मचारी को भुगतान के लिए प्राधिकरण को भेज देगा।
(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट दावे के लिए प्राधिकारी के समक्ष कोई आवेदन निम्नलिखित द्वारा दाखिल किया जा सकता है:--
(क) संबंधित कर्मचारी; या
(ख) ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 (16 ऑफ 1926) के तहत पंजीकृत कोई भी ट्रेड यूनियन जिसका कर्मचारी सदस्य है; या
(ग) निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता।
(5) ऐसे नियम बनाए जाने के अधीन, किसी प्रतिष्ठान में नियोजित कर्मचारियों की किसी भी संख्या की ओर से या उनके संबंध में इस धारा के अंतर्गत एक ही आवेदन दाखिल किया जा सकता है।
(6) उपधारा (4) के अंतर्गत आवेदन उपधारा (1) में निर्दिष्ट दावों के उत्पन्न होने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के भीतर दाखिल किया जा सकता है:
बशर्ते कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी, आवेदक द्वारा ऐसे विलंब के लिए पर्याप्त कारण बताए जाने पर तीन वर्ष बाद आवेदन पर विचार कर सकता है।
(7) धारा 49 की उपधारा (1) के तहत नियुक्त प्राधिकारी तथा उपधारा (1) के तहत नियुक्त अपीलीय प्राधिकारी को साक्ष्य लेने तथा गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य करने तथा दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी, और ऐसा प्रत्येक प्राधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 तथा अध्याय XXVI के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी, उस उपधारा के अधीन दावे का निर्णय करते समय, उन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिनके अंतर्गत दावा उत्पन्न होता है, निर्धारित दावे के अतिरिक्त मुआवजे के भुगतान का आदेश दे सकता है, जो निर्धारित दावे के दस गुना तक हो सकता है, और प्राधिकारी द्वारा दावे का निर्णय तीन माह की अवधि के भीतर करने का प्रयास किया जाएगा।
(3) यदि कोई नियोक्ता उपधारा (2) के तहत निर्धारित दावा और भुगतान करने का आदेश दिया गया मुआवजा देने में विफल रहता है, तो प्राधिकरण उस जिले के कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को वसूली का प्रमाण पत्र जारी करेगा जहां प्रतिष्ठान स्थित है, जो इसे भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल करेगा और संबंधित कर्मचारी को भुगतान के लिए प्राधिकरण को भेज देगा।
(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट दावे के लिए प्राधिकारी के समक्ष कोई आवेदन निम्नलिखित द्वारा दाखिल किया जा सकता है:--
(क) संबंधित कर्मचारी; या
(ख) ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 (16 ऑफ 1926) के तहत पंजीकृत कोई भी ट्रेड यूनियन जिसका कर्मचारी सदस्य है; या
(ग) निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता।
(5) ऐसे नियम बनाए जाने के अधीन, किसी प्रतिष्ठान में नियोजित कर्मचारियों की किसी भी संख्या की ओर से या उनके संबंध में इस धारा के अंतर्गत एक ही आवेदन दाखिल किया जा सकता है।
(6) उपधारा (4) के अंतर्गत आवेदन उपधारा (1) में निर्दिष्ट दावों के उत्पन्न होने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के भीतर दाखिल किया जा सकता है:
बशर्ते कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी, आवेदक द्वारा ऐसे विलंब के लिए पर्याप्त कारण बताए जाने पर तीन वर्ष बाद आवेदन पर विचार कर सकता है।
(7) धारा 49 की उपधारा (1) के तहत नियुक्त प्राधिकारी तथा उपधारा (1) के तहत नियुक्त अपीलीय प्राधिकारी को साक्ष्य लेने तथा गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य करने तथा दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी, और ऐसा प्रत्येक प्राधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 तथा अध्याय XXVI के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय माना जाएगा।
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