IC Act 28अध्याय II · Void agreements
धारा 28 · कानूनी कार्यवाही को रोकने वाले समझौते अमान्य होते हैं।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
1 प्रत्येक समझौता,—
(क) जिसके द्वारा किसी भी पक्ष को सामान्य न्यायाधिकरणों में सामान्य कानूनी कार्यवाही द्वारा किसी अनुबंध के अंतर्गत या उसके संबंध में अपने अधिकारों को लागू करने से पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाता है, या जो उस समय सीमा को सीमित करता है जिसके भीतर वह अपने अधिकारों को इस प्रकार लागू कर सकता है; या
(ख) जो किसी अनुबंध के किसी पक्ष के अधिकारों को समाप्त कर देता है, या किसी पक्ष को किसी निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर किसी दायित्व से मुक्त कर देता है, जिससे किसी पक्ष को अपने अधिकारों को लागू करने से प्रतिबंधित किया जा सके, वह उस सीमा तक शून्य है।
अपवाद 1.— विवाद उत्पन्न होने पर मध्यस्थता के लिए अनुबंध का संरक्षण.— यह धारा किसी ऐसे अनुबंध को अवैध नहीं ठहराएगी, जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति इस बात पर सहमत हों कि किसी विषय या विषयों के वर्ग के संबंध में उनके बीच उत्पन्न होने वाले किसी भी विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा, और इस प्रकार भेजे गए विवाद के संबंध में केवल मध्यस्थता में दी गई राशि ही वसूली योग्य होगी।
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अपवाद 2.— पहले से उत्पन्न प्रश्नों को संदर्भित करने के लिए अनुबंध का संरक्षण.— न ही यह धारा किसी लिखित अनुबंध को अवैध ठहराएगी, जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति अपने बीच किसी ऐसे प्रश्न को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने पर सहमत होते हैं जो पहले से ही उत्पन्न हो चुका है, या मध्यस्थता के संदर्भों के संबंध में उस समय लागू किसी कानून के किसी प्रावधान को प्रभावित करेगी ।
4 अपवाद 3.— बैंक या वित्तीय संस्था के गारंटी समझौते का संरक्षण.— यह धारा किसी लिखित अनुबंध को अवैध नहीं ठहराएगी जिसके द्वारा कोई बैंक या वित्तीय संस्था किसी गारंटी या किसी ऐसे समझौते में कोई शर्त निर्धारित करती है जिसमें किसी पक्ष के अधिकारों के समाप्त होने या ऐसी गारंटी या समझौते के संबंध में किसी दायित्व से मुक्त होने का प्रावधान हो, जो किसी निर्दिष्ट घटना के घटित होने या न होने की तारीख से एक वर्ष से कम न हो।
स्पष्टीकरण .—(i) अपवाद 3 में, "बैंक" अभिव्यक्ति का अर्थ है—
(क) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (ग) में परिभाषित "बैंकिंग कंपनी";
(ख) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (दा) में परिभाषित "संगत नया बैंक";
(ग) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम, 1955 (23 ऑफ 1955) की धारा 3 के तहत गठित "स्टेट बैंक ऑफ इंडिया";
(घ) भारतीय स्टेट बैंक (सहायक बैंक) अधिनियम, 1959 (38 ऑफ 1959) की धारा 2 के खंड (के) में परिभाषित "सहायक बैंक";
(ई) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (21 ऑफ 1976) की धारा 3 के तहत स्थापित "क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक";
(f) "सहकारी बैंक" जैसा कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (सीसीआई) में परिभाषित है;
(जी) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (सीसीआईआईए) में परिभाषित "बहु-राज्य सहकारी बैंक"; और
(ii) अपवाद 3 में, "वित्तीय संस्था" अभिव्यक्ति से तात्पर्य कंपनी अधिनियम, 1956 (1 ऑफ 1956) की धारा 4ए के अर्थ में किसी भी सार्वजनिक वित्तीय संस्था से है।
(क) जिसके द्वारा किसी भी पक्ष को सामान्य न्यायाधिकरणों में सामान्य कानूनी कार्यवाही द्वारा किसी अनुबंध के अंतर्गत या उसके संबंध में अपने अधिकारों को लागू करने से पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाता है, या जो उस समय सीमा को सीमित करता है जिसके भीतर वह अपने अधिकारों को इस प्रकार लागू कर सकता है; या
(ख) जो किसी अनुबंध के किसी पक्ष के अधिकारों को समाप्त कर देता है, या किसी पक्ष को किसी निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर किसी दायित्व से मुक्त कर देता है, जिससे किसी पक्ष को अपने अधिकारों को लागू करने से प्रतिबंधित किया जा सके, वह उस सीमा तक शून्य है।
अपवाद 1.— विवाद उत्पन्न होने पर मध्यस्थता के लिए अनुबंध का संरक्षण.— यह धारा किसी ऐसे अनुबंध को अवैध नहीं ठहराएगी, जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति इस बात पर सहमत हों कि किसी विषय या विषयों के वर्ग के संबंध में उनके बीच उत्पन्न होने वाले किसी भी विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा, और इस प्रकार भेजे गए विवाद के संबंध में केवल मध्यस्थता में दी गई राशि ही वसूली योग्य होगी।
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अपवाद 2.— पहले से उत्पन्न प्रश्नों को संदर्भित करने के लिए अनुबंध का संरक्षण.— न ही यह धारा किसी लिखित अनुबंध को अवैध ठहराएगी, जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति अपने बीच किसी ऐसे प्रश्न को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने पर सहमत होते हैं जो पहले से ही उत्पन्न हो चुका है, या मध्यस्थता के संदर्भों के संबंध में उस समय लागू किसी कानून के किसी प्रावधान को प्रभावित करेगी ।
4 अपवाद 3.— बैंक या वित्तीय संस्था के गारंटी समझौते का संरक्षण.— यह धारा किसी लिखित अनुबंध को अवैध नहीं ठहराएगी जिसके द्वारा कोई बैंक या वित्तीय संस्था किसी गारंटी या किसी ऐसे समझौते में कोई शर्त निर्धारित करती है जिसमें किसी पक्ष के अधिकारों के समाप्त होने या ऐसी गारंटी या समझौते के संबंध में किसी दायित्व से मुक्त होने का प्रावधान हो, जो किसी निर्दिष्ट घटना के घटित होने या न होने की तारीख से एक वर्ष से कम न हो।
स्पष्टीकरण .—(i) अपवाद 3 में, "बैंक" अभिव्यक्ति का अर्थ है—
(क) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (ग) में परिभाषित "बैंकिंग कंपनी";
(ख) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (दा) में परिभाषित "संगत नया बैंक";
(ग) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम, 1955 (23 ऑफ 1955) की धारा 3 के तहत गठित "स्टेट बैंक ऑफ इंडिया";
(घ) भारतीय स्टेट बैंक (सहायक बैंक) अधिनियम, 1959 (38 ऑफ 1959) की धारा 2 के खंड (के) में परिभाषित "सहायक बैंक";
(ई) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (21 ऑफ 1976) की धारा 3 के तहत स्थापित "क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक";
(f) "सहकारी बैंक" जैसा कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (सीसीआई) में परिभाषित है;
(जी) बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) की धारा 5 के खंड (सीसीआईआईए) में परिभाषित "बहु-राज्य सहकारी बैंक"; और
(ii) अपवाद 3 में, "वित्तीय संस्था" अभिव्यक्ति से तात्पर्य कंपनी अधिनियम, 1956 (1 ऑफ 1956) की धारा 4ए के अर्थ में किसी भी सार्वजनिक वित्तीय संस्था से है।
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