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CrPC धारा 151 Arrest to prevent commission of cognizable offences अब BNSS धारा 170 है
धारा 151. संज्ञेय अपराधों के किए जाने का निवारण करने के लिए गिरफ्तारी
पुराना कानून
CrPC §151 Arrest to prevent commission of cognizable offences
धारा 151. संज्ञेय अपराधों के किए जाने का निवारण करने के लिए गिरफ्तारी
151. संज्ञेय अपराधों के किए जाने का निवारण करने के लिए गिरफ्तारी
(1) कोई पुलिस अधिकारी, जिसे किसी संज्ञेय अपराध को करने की परिकल्पना का पता है, ऐसी परिकल्पना करने वाले व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेशों के बिना और वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा, यदि ऐसे अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि उस अपराध का किया जाना अन्यथा निवारित नहीं किया जा सकता।
(2) उपधारा (1) के अधीन गिरफ्तार किया गया कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा, जब तक कि उसका और आगे निरुद्ध रखा जाना इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन अपेक्षित या प्राधिकृत न हो।
राज्य संशोधन
महाराष्ट्र—
धारा 151 में,—
(क) उपधारा (2) में, "अपेक्षित या प्राधिकृत" शब्दों के पश्चात् "उपधारा (3) के अधीन या" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"(3) (क) जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन गिरफ्तार किया जाता है और गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को, या पुलिस थाने के उस भारसाधक अधिकारी को, जिसके समक्ष गिरफ्तार किया गया व्यक्ति पेश किया जाता है, यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए (उस समय को छोड़कर, जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक ले जाने के लिए अपेक्षित है) निरुद्ध रखा जाना इस कारण से आवश्यक है कि—
(i) वह व्यक्ति अपने छोड़े जाने के पश्चात् उपधारा (1) में निर्दिष्ट संज्ञेय अपराध करने की परिकल्पना को जारी रखेगा, या ऐसा अपराध करेगा, यह संभाव्य है; और
(ii) उस मामले की परिस्थितियां ऐसी हैं कि उसका बाहर रहना लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिकूल होना संभाव्य है,
वहां गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी, या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को, ऐसे व्यक्ति को चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए निरंतर निरुद्ध रखे जाने के कारण कथित करने वाली लिखित रिपोर्ट सहित, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करेगा।
(ख) इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां उस मजिस्ट्रेट का, जिसके समक्ष ऐसा गिरफ्तार किया गया व्यक्ति पेश किया जाता है, यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति को चौबीस घंटे की अवधि से आगे अभिरक्षा में अस्थायी रूप से निरुद्ध रखने के लिए युक्तियुक्त आधार हैं, वहां वह समय-समय पर, आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति को ऐसी अभिरक्षा में सुपुर्द कर सकेगा, जैसी वह ठीक समझे:
परन्तु कोई भी व्यक्ति इस धारा के अधीन एक बार में पंद्रह दिन से अधिक की अवधि के लिए, और ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी की तारीख से कुल मिलाकर तीस दिन से अधिक की अवधि के लिए, निरुद्ध नहीं रखा जाएगा।
(ग) जब किसी व्यक्ति को खंड (ख) के अधीन अभिरक्षा में सुपुर्द किया जाता है, तब मजिस्ट्रेट, यथाशीघ्र, ऐसे व्यक्ति को वे आधार संसूचित करेगा, जिन पर वह आदेश किया गया है, और ऐसा व्यक्ति उस आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय को अभ्यावेदन कर सकेगा। सेशन न्यायाधीश, ऐसा अभ्यावेदन प्राप्त होने पर, ऐसी जांच करने के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, या तो उस अभ्यावेदन को नामंजूर कर सकेगा, या यदि वह यह समझता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का और आगे निरुद्ध रखा जाना आवश्यक नहीं है, या यह कि ऐसा करना अन्यथा उचित और न्यायसंगत है, तो वह उस आदेश को विखंडित कर सकेगा और तब गिरफ्तार किया गया व्यक्ति तुरंत छोड़ दिया जाएगा।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1981 का 7 द्वारा (27-5-1980 से प्रभावी)।]
पूरा पढ़ें: CrPC §151 Arrest to prevent commission of cognizable offences(1) कोई पुलिस अधिकारी, जिसे किसी संज्ञेय अपराध को करने की परिकल्पना का पता है, ऐसी परिकल्पना करने वाले व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेशों के बिना और वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा, यदि ऐसे अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि उस अपराध का किया जाना अन्यथा निवारित नहीं किया जा सकता।
(2) उपधारा (1) के अधीन गिरफ्तार किया गया कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा, जब तक कि उसका और आगे निरुद्ध रखा जाना इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन अपेक्षित या प्राधिकृत न हो।
राज्य संशोधन
महाराष्ट्र—
धारा 151 में,—
(क) उपधारा (2) में, "अपेक्षित या प्राधिकृत" शब्दों के पश्चात् "उपधारा (3) के अधीन या" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"(3) (क) जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन गिरफ्तार किया जाता है और गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को, या पुलिस थाने के उस भारसाधक अधिकारी को, जिसके समक्ष गिरफ्तार किया गया व्यक्ति पेश किया जाता है, यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए (उस समय को छोड़कर, जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक ले जाने के लिए अपेक्षित है) निरुद्ध रखा जाना इस कारण से आवश्यक है कि—
(i) वह व्यक्ति अपने छोड़े जाने के पश्चात् उपधारा (1) में निर्दिष्ट संज्ञेय अपराध करने की परिकल्पना को जारी रखेगा, या ऐसा अपराध करेगा, यह संभाव्य है; और
(ii) उस मामले की परिस्थितियां ऐसी हैं कि उसका बाहर रहना लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिकूल होना संभाव्य है,
वहां गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी, या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को, ऐसे व्यक्ति को चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए निरंतर निरुद्ध रखे जाने के कारण कथित करने वाली लिखित रिपोर्ट सहित, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करेगा।
(ख) इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां उस मजिस्ट्रेट का, जिसके समक्ष ऐसा गिरफ्तार किया गया व्यक्ति पेश किया जाता है, यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति को चौबीस घंटे की अवधि से आगे अभिरक्षा में अस्थायी रूप से निरुद्ध रखने के लिए युक्तियुक्त आधार हैं, वहां वह समय-समय पर, आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति को ऐसी अभिरक्षा में सुपुर्द कर सकेगा, जैसी वह ठीक समझे:
परन्तु कोई भी व्यक्ति इस धारा के अधीन एक बार में पंद्रह दिन से अधिक की अवधि के लिए, और ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी की तारीख से कुल मिलाकर तीस दिन से अधिक की अवधि के लिए, निरुद्ध नहीं रखा जाएगा।
(ग) जब किसी व्यक्ति को खंड (ख) के अधीन अभिरक्षा में सुपुर्द किया जाता है, तब मजिस्ट्रेट, यथाशीघ्र, ऐसे व्यक्ति को वे आधार संसूचित करेगा, जिन पर वह आदेश किया गया है, और ऐसा व्यक्ति उस आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय को अभ्यावेदन कर सकेगा। सेशन न्यायाधीश, ऐसा अभ्यावेदन प्राप्त होने पर, ऐसी जांच करने के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, या तो उस अभ्यावेदन को नामंजूर कर सकेगा, या यदि वह यह समझता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का और आगे निरुद्ध रखा जाना आवश्यक नहीं है, या यह कि ऐसा करना अन्यथा उचित और न्यायसंगत है, तो वह उस आदेश को विखंडित कर सकेगा और तब गिरफ्तार किया गया व्यक्ति तुरंत छोड़ दिया जाएगा।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1981 का 7 द्वारा (27-5-1980 से प्रभावी)।]
नया कानून
BNSS §170
संज्ञेय अपराधों को रोकने के लिए गिरफ्तारी।
(1) किसी संज्ञेय अपराध को अंजाम देने की योजना की जानकारी रखने वाला पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना और वारंट के बिना, ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है, यदि उस अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि अपराध को होने से अन्यथा रोका नहीं जा सकता है।
(2) उपधारा (1) के तहत गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए हिरासत में नहीं रखा जाएगा, जब तक कि इस संहिता या उस समय लागू किसी अन्य कानून के किसी अन्य प्रावधान के तहत उसकी आगे की हिरासत आवश्यक या अधिकृत न हो।
पूरा पढ़ें: BNSS §170(2) उपधारा (1) के तहत गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के समय से चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए हिरासत में नहीं रखा जाएगा, जब तक कि इस संहिता या उस समय लागू किसी अन्य कानून के किसी अन्य प्रावधान के तहत उसकी आगे की हिरासत आवश्यक या अधिकृत न हो।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
