पाठ लगभग अपरिवर्तित है
BNSS धारा 345 अब CrPC धारा 308 है
क्षमादान की शर्तों का पालन न करने वाले व्यक्ति का मुकदमा।
पुराना कानून
BNSS §345
क्षमादान की शर्तों का पालन न करने वाले व्यक्ति का मुकदमा।
(1) जहां किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में, जिसने धारा 343 या धारा 344 के तहत क्षमादान का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है, लोक अभियोजक यह प्रमाणित करता है कि उसकी राय में ऐसे व्यक्ति ने जानबूझकर किसी आवश्यक बात को छुपाकर या झूठी गवाही देकर उस शर्त का पालन नहीं किया है जिस पर प्रस्ताव दिया गया था, तो ऐसे व्यक्ति पर उस अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है जिसके संबंध में क्षमादान का प्रस्ताव दिया गया था या किसी अन्य अपराध के लिए जिसमें वह उसी मामले के संबंध में दोषी प्रतीत होता है, और झूठी गवाही देने के अपराध के लिए भी मुकदमा चलाया जा सकता है:
बशर्ते कि ऐसे व्यक्ति पर अन्य आरोपियों के साथ संयुक्त रूप से मुकदमा नहीं चलाया जाएगा:
इसके अलावा, ऐसे व्यक्ति पर झूठी गवाही देने के अपराध के लिए उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, और धारा 215 या धारा 379 में निहित कोई भी बात उस अपराध पर लागू नहीं होगी।
(2) क्षमादान स्वीकार करते हुए ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया कोई भी बयान, जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 183 के तहत या न्यायालय द्वारा धारा 343 की उपधारा (4) के तहत दर्ज किया गया हो, ऐसे मुकदमे में उसके विरुद्ध साक्ष्य के रूप में दिया जा सकता है।
(3) ऐसे मुकदमे में, अभियुक्त को यह दलील देने का अधिकार होगा कि उसने उस शर्त का पालन किया है जिस पर ऐसा प्रस्ताव रखा गया था; इस मामले में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि शर्त का पालन नहीं किया गया है।
(4) ऐसे मुकदमे में न्यायालय---
(क) यदि यह सत्र न्यायालय है, तो अभियोग पढ़कर अभियुक्त को समझाने से पहले;
(ख) यदि यह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है, तो अभियोजन पक्ष के गवाहों के साक्ष्य लेने से पहले,
अभियुक्त से पूछें कि क्या वह यह स्वीकार करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिनके आधार पर क्षमादान की पेशकश की गई थी।
(5) यदि अभियुक्त ऐसा निवेदन करे, तो न्यायालय निवेदन दर्ज करेगा और मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाएगा तथा मामले में निर्णय देने से पहले यह पता लगाएगा कि अभियुक्त ने क्षमादान की शर्तों का पालन किया है या नहीं, और यदि न्यायालय यह पाता है कि उसने शर्तों का पालन किया है, तो इस संहिता में किसी भी बात के होते हुए भी, वह बरी करने का निर्णय देगा।
पूरा पढ़ें: BNSS §345बशर्ते कि ऐसे व्यक्ति पर अन्य आरोपियों के साथ संयुक्त रूप से मुकदमा नहीं चलाया जाएगा:
इसके अलावा, ऐसे व्यक्ति पर झूठी गवाही देने के अपराध के लिए उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, और धारा 215 या धारा 379 में निहित कोई भी बात उस अपराध पर लागू नहीं होगी।
(2) क्षमादान स्वीकार करते हुए ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया कोई भी बयान, जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 183 के तहत या न्यायालय द्वारा धारा 343 की उपधारा (4) के तहत दर्ज किया गया हो, ऐसे मुकदमे में उसके विरुद्ध साक्ष्य के रूप में दिया जा सकता है।
(3) ऐसे मुकदमे में, अभियुक्त को यह दलील देने का अधिकार होगा कि उसने उस शर्त का पालन किया है जिस पर ऐसा प्रस्ताव रखा गया था; इस मामले में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि शर्त का पालन नहीं किया गया है।
(4) ऐसे मुकदमे में न्यायालय---
(क) यदि यह सत्र न्यायालय है, तो अभियोग पढ़कर अभियुक्त को समझाने से पहले;
(ख) यदि यह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है, तो अभियोजन पक्ष के गवाहों के साक्ष्य लेने से पहले,
अभियुक्त से पूछें कि क्या वह यह स्वीकार करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिनके आधार पर क्षमादान की पेशकश की गई थी।
(5) यदि अभियुक्त ऐसा निवेदन करे, तो न्यायालय निवेदन दर्ज करेगा और मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाएगा तथा मामले में निर्णय देने से पहले यह पता लगाएगा कि अभियुक्त ने क्षमादान की शर्तों का पालन किया है या नहीं, और यदि न्यायालय यह पाता है कि उसने शर्तों का पालन किया है, तो इस संहिता में किसी भी बात के होते हुए भी, वह बरी करने का निर्णय देगा।
नया कानून
CrPC §308
धारा 308. क्षमादान की शर्तों का पालन न करने वाले व्यक्ति का विचारण
308. क्षमादान की शर्तों का पालन न करने वाले व्यक्ति का विचारण
(1) जहां धारा 306 या धारा 307 के अधीन किए गए क्षमादान के प्रस्थापन को स्वीकार कर लेने वाले किसी व्यक्ति के बारे में लोक अभियोजक यह प्रमाणित करता है कि उसकी राय में ऐसे व्यक्ति ने, या तो किसी आवश्यक बात को जानबूझकर छिपाकर या मिथ्या साक्ष्य देकर, उस शर्त का पालन नहीं किया है जिस पर वह प्रस्थापन किया गया था, वहां ऐसे व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसकी बाबत क्षमादान इस प्रकार प्रस्थापित किया गया था, या किसी अन्य ऐसे अपराध के लिए जिसका वह उसी विषय के संबंध में दोषी प्रतीत होता है, तथा मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए भी, किया जा सकेगा:
परन्तु ऐसे व्यक्ति का विचारण अन्य अभियुक्त व्यक्तियों में से किसी के साथ संयुक्त रूप से नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और कि ऐसे व्यक्ति का विचारण मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए उच्च न्यायालय की मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा, और धारा 195 या धारा 340 में अंतर्विष्ट कोई बात उस अपराध को लागू नहीं होगी।
(2) क्षमादान के प्रस्थापन को स्वीकार करने वाले ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया और धारा 164 के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा या धारा 306 की उपधारा (4) के अधीन न्यायालय द्वारा अभिलिखित कोई कथन ऐसे विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा।
(3) ऐसे विचारण में अभियुक्त यह अभिवचन करने का हकदार होगा कि उसने उस शर्त का पालन किया है जिस पर ऐसा प्रस्थापन किया गया था, और ऐसी दशा में यह साबित करना अभियोजन का काम होगा कि शर्त का पालन नहीं किया गया है।
(4) ऐसे विचारण में न्यायालय—
(क) यदि वह सेशन न्यायालय है तो, आरोप के अभियुक्त को पढ़कर सुनाए और समझाए जाने के पहले;
(ख) यदि वह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है तो, अभियोजन के साक्षियों का साक्ष्य लिए जाने के पहले,
अभियुक्त से यह पूछेगा कि क्या वह यह अभिवचन करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिन पर क्षमादान का प्रस्थापन किया गया था।
(5) यदि अभियुक्त ऐसा अभिवचन करता है तो न्यायालय उस अभिवचन को अभिलिखित करेगा और विचारण चलाएगा तथा वह मामले में निर्णय देने के पहले यह निष्कर्ष निकालेगा कि अभियुक्त ने क्षमादान की शर्तों का पालन किया है या नहीं, और यदि वह यह पाता है कि उसने ऐसा पालन किया है तो, इस संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वह दोषमुक्ति का निर्णय देगा।
पूरा पढ़ें: CrPC §308(1) जहां धारा 306 या धारा 307 के अधीन किए गए क्षमादान के प्रस्थापन को स्वीकार कर लेने वाले किसी व्यक्ति के बारे में लोक अभियोजक यह प्रमाणित करता है कि उसकी राय में ऐसे व्यक्ति ने, या तो किसी आवश्यक बात को जानबूझकर छिपाकर या मिथ्या साक्ष्य देकर, उस शर्त का पालन नहीं किया है जिस पर वह प्रस्थापन किया गया था, वहां ऐसे व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसकी बाबत क्षमादान इस प्रकार प्रस्थापित किया गया था, या किसी अन्य ऐसे अपराध के लिए जिसका वह उसी विषय के संबंध में दोषी प्रतीत होता है, तथा मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए भी, किया जा सकेगा:
परन्तु ऐसे व्यक्ति का विचारण अन्य अभियुक्त व्यक्तियों में से किसी के साथ संयुक्त रूप से नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और कि ऐसे व्यक्ति का विचारण मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए उच्च न्यायालय की मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा, और धारा 195 या धारा 340 में अंतर्विष्ट कोई बात उस अपराध को लागू नहीं होगी।
(2) क्षमादान के प्रस्थापन को स्वीकार करने वाले ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया और धारा 164 के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा या धारा 306 की उपधारा (4) के अधीन न्यायालय द्वारा अभिलिखित कोई कथन ऐसे विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा।
(3) ऐसे विचारण में अभियुक्त यह अभिवचन करने का हकदार होगा कि उसने उस शर्त का पालन किया है जिस पर ऐसा प्रस्थापन किया गया था, और ऐसी दशा में यह साबित करना अभियोजन का काम होगा कि शर्त का पालन नहीं किया गया है।
(4) ऐसे विचारण में न्यायालय—
(क) यदि वह सेशन न्यायालय है तो, आरोप के अभियुक्त को पढ़कर सुनाए और समझाए जाने के पहले;
(ख) यदि वह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है तो, अभियोजन के साक्षियों का साक्ष्य लिए जाने के पहले,
अभियुक्त से यह पूछेगा कि क्या वह यह अभिवचन करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिन पर क्षमादान का प्रस्थापन किया गया था।
(5) यदि अभियुक्त ऐसा अभिवचन करता है तो न्यायालय उस अभिवचन को अभिलिखित करेगा और विचारण चलाएगा तथा वह मामले में निर्णय देने के पहले यह निष्कर्ष निकालेगा कि अभियुक्त ने क्षमादान की शर्तों का पालन किया है या नहीं, और यदि वह यह पाता है कि उसने ऐसा पालन किया है तो, इस संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वह दोषमुक्ति का निर्णय देगा।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
