सीआरपीसी → बीएनएसएस
22 प्रविष्टियाँ
धारा 47. उस स्थान की तलाशी, जिसमें गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति घुसा हो
47. उस स्थान की तलाशी, जिसमें गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति घुसा हो (1) यदि गिरफ्तारी के वारंट के अधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को, या गिरफ्तार करने का प्राधिकार रखने वाले किसी पुलिस अधिकारी को, यह विश्वास करने का कारण है कि गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति किसी स्थान में घुसा है या उसके भीतर है, तो ऐसे स्थान में…
पूरा पढ़ेंजिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाना है, उसके द्वारा प्रवेश किए गए स्थान की तलाशी।
(1) यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी वारंट के तहत कार्य करते हुए, या किसी पुलिस अधिकारी को, जिसे गिरफ्तार करने का अधिकार है, यह विश्वास करने का कारण हो कि गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति किसी स्थान में प्रवेश कर चुका है, या उस स्थान के भीतर है, तो ऐसे स्थान में रहने वाला या उस स्थान का प्रभारी कोई भी व्यक्ति, उपर्युक्त…
पूरा पढ़ेंधारा 50. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की और जमानत के अधिकार की इत्तिला दिया जाना
50. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की और जमानत के अधिकार की इत्तिला दिया जाना (1) हर पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति, जो किसी व्यक्ति को वारंट के बिना गिरफ्तार करता है, उस अपराध की, जिसके लिए वह गिरफ्तार किया गया है, पूरी विशिष्टियां या ऐसी गिरफ्तारी के अन्य आधार उसे तुरंत संसूचित करेगा। (2) जहां कोई…
पूरा पढ़ेंगिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों और जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाएगा।
(1) प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति जो किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार करता है, उसे तुरंत उस अपराध का पूरा विवरण या ऐसी गिरफ्तारी के अन्य आधारों की जानकारी देगा। (2) जहाँ कोई पुलिस अधिकारी गैर-जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार करता है, तो वह गिरफ्तार…
पूरा पढ़ेंधारा 430. दंडादेश के निष्पादन पर वारंट का लौटाया जाना
430. दंडादेश के निष्पादन पर वारंट का लौटाया जाना जब दंडादेश का पूर्णतः निष्पादन कर दिया गया है, तब उसका निष्पादन करने वाला अधिकारी वारंट को उस न्यायालय को, जिससे वह जारी किया गया है, अपने हस्ताक्षर सहित इस बात का पृष्ठांकन करके लौटाएगा कि दंडादेश का निष्पादन किस रीति से किया गया है।
पूरा पढ़ेंसजा के निष्पादन पर वारंट की वापसी।
जब किसी सजा को पूरी तरह से लागू कर दिया जाता है, तो उसे लागू करने वाला अधिकारी वारंट को उस न्यायालय को लौटा देगा जहां से इसे जारी किया गया था, और उस पर अपने हस्ताक्षर से यह प्रमाणित करेगा कि सजा को किस प्रकार लागू किया गया है।
पूरा पढ़ेंधारा 431. संदाय के लिए आदिष्ट धन का जुर्माने के रूप में वसूलीय होना
431. संदाय के लिए आदिष्ट धन का जुर्माने के रूप में वसूलीय होना इस संहिता के अधीन किए गए किसी आदेश के आधार पर संदेय कोई धन (जुर्माने से भिन्न), जिसकी वसूली की रीति अन्यथा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित नहीं है, इस प्रकार वसूलीय होगा मानो वह जुर्माना हो: परन्तु धारा 421, इस धारा के आधार पर धारा 359 के अधीन किए गए आदेश के…
पूरा पढ़ेंजुर्माना के रूप में वसूली योग्य धनराशि का भुगतान करने का आदेश दिया गया है।
इस संहिता के अंतर्गत जारी किसी आदेश के आधार पर देय कोई भी धनराशि (जुर्माने के अतिरिक्त), जिसकी वसूली का तरीका अन्यथा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है, जुर्माने की तरह ही वसूल की जाएगी। बशर्ते कि धारा 461, धारा 400 के तहत किसी आदेश पर लागू होने पर, इस धारा के आधार पर, इस प्रकार समझी जाएगी मानो धारा 461 की उपधारा (1) के…
पूरा पढ़ेंनई धारा
-
मृत्युदंड के मामलों में दया याचिका।
(1) मृत्युदंड प्राप्त कोई दोषी या उसका कानूनी वारिस या कोई अन्य संबंधी, यदि उसने पहले से दया याचिका प्रस्तुत नहीं की है, तो कारागार अधीक्षक द्वारा मृत्युदंड दिए जाने की तिथि से तीस दिनों की अवधि के भीतर संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत भारत के राष्ट्रपति या अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका…
पूरा पढ़ेंधारा 432. दंडादेशों को निलंबित करने या उनका परिहार करने की शक्ति
432. दंडादेशों को निलंबित करने या उनका परिहार करने की शक्ति (1) जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दंड का दंडादेश दिया गया है, तब समुचित सरकार किसी भी समय, बिना शर्त या ऐसी शर्तों पर जो दंडादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करे, उसके दंडादेश के निष्पादन को निलंबित कर सकेगी या उस दंड का, जिसका उसे दंडादेश दिया गया है, पूर्णतः या…
पूरा पढ़ेंसजा को निलंबित करने या माफ करने का अधिकार।
(1) जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए सजा सुनाई गई हो, तो उपयुक्त सरकार किसी भी समय, बिना किसी शर्त के या ऐसी किसी शर्त पर जिसे सजा पाए व्यक्ति स्वीकार करता हो, उसकी सजा के निष्पादन को निलंबित कर सकती है या उसे सुनाई गई सजा के पूरे या किसी भाग को माफ कर सकती है। (2) जब भी उपयुक्त सरकार को किसी सजा के निलंबन या माफी…
पूरा पढ़ेंधारा 433. दंडादेश के लघुकरण की शक्ति
433. दंडादेश के लघुकरण की शक्ति समुचित सरकार, दंडादिष्ट व्यक्ति की सहमति के बिना,— (क) मृत्यु के दंडादेश को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) द्वारा उपबंधित किसी अन्य दंड में; (ख) आजीवन कारावास के दंडादेश को चौदह वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास में या जुर्माने में; (ग) कठिन कारावास के दंडादेश को किसी ऐसी अवधि के सादे…
पूरा पढ़ेंसजा कम करने का अधिकार।
उपयुक्त सरकार, सजा पाए व्यक्ति की सहमति के बिना भी, सजा को कम कर सकती है--- (क) मृत्युदंड, आजीवन कारावास; (ख) आजीवन कारावास की सजा, या कम से कम सात वर्ष की अवधि के लिए कारावास की सजा; (ग) सात वर्ष या उससे अधिक की कारावास की सजा, तीन वर्ष से कम अवधि के कारावास के लिए नहीं; (घ) सात वर्ष से कम की कारावास की सजा, जुर्माना…
पूरा पढ़ेंधारा 433A. कतिपय मामलों में परिहार या लघुकरण की शक्तियों पर निर्बंधन
433A. कतिपय मामलों में परिहार या लघुकरण की शक्तियों पर निर्बंधन धारा 432 में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि पर आजीवन कारावास का दंडादेश दिया जाता है जिसके लिए विधि द्वारा उपबंधित दंडों में से एक मृत्यु है, या जहां किसी व्यक्ति को दिया गया मृत्यु का दंडादेश धारा 433 के अधीन…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में माफी या सजा कम करने की शक्तियों पर प्रतिबंध।
धारा 473 में किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है जिसके लिए कानून द्वारा मृत्युदंड का प्रावधान है, या यदि किसी व्यक्ति को धारा 474 के तहत दी गई मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया है, तो ऐसे व्यक्ति को कारावास से तब तक रिहा नहीं किया…
पूरा पढ़ेंधारा 434. मृत्यु दंडादेशों की दशा में केंद्रीय सरकार की समवर्ती शक्ति
434. मृत्यु दंडादेशों की दशा में केंद्रीय सरकार की समवर्ती शक्ति धारा 432 और धारा 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग, मृत्यु के दंडादेशों की दशा में, केंद्रीय सरकार द्वारा भी किया जा सकेगा।
पूरा पढ़ेंमृत्युदंड के मामलों में केंद्र सरकार की समवर्ती शक्तियां।
धारा 473 और 474 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियां, मृत्युदंड के मामलों में, केंद्र सरकार द्वारा भी प्रयोग की जा सकती हैं।
पूरा पढ़ेंधारा 435. कुछ मामलों में राज्य सरकार का केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात् कार्य करना
435. कुछ मामलों में राज्य सरकार का केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात् कार्य करना (1) दंडादेश का परिहार या लघुकरण करने के लिए धारा 432 और धारा 433 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का, ऐसे किसी मामले में जिसमें दंडादेश ऐसे अपराध के लिए है— (क) जिसका अन्वेषण दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) के…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में राज्य सरकार केंद्र सरकार की सहमति के बाद ही कार्रवाई करेगी।
(1) धारा 473 और 474 द्वारा राज्य सरकार को किसी भी मामले में सजा माफ करने या कम करने के लिए प्रदत्त शक्तियां, जहां सजा किसी अपराध के लिए हो--- (क) जिसकी जांच इस संहिता के अलावा किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम के तहत किसी अपराध की जांच करने के लिए अधिकृत किसी एजेंसी द्वारा की गई हो; या (ख) जिसमें केंद्र सरकार की किसी संपत्ति…
पूरा पढ़ेंधारा 436. किन मामलों में जमानत ली जाएगी
436. किन मामलों में जमानत ली जाएगी (1) जब किसी अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है, या किसी न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, और वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में रहते हुए किसी समय, अथवा ऐसे न्यायालय के…
पूरा पढ़ेंकिन मामलों में जमानत ली जा सकती है?
(1) जब किसी गैर-जमानती अपराध के आरोपी व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार या हिरासत में लिया जाता है, या वह किसी न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है, और यदि वह अधिकारी की हिरासत में रहते हुए या न्यायालय के समक्ष कार्यवाही के किसी भी चरण में…
पूरा पढ़ेंधारा 436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा
436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा जहां किसी व्यक्ति ने, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (ऐसे अपराध से भिन्न जिसके लिए उस विधि के अधीन दंडों में से एक के रूप में मृत्यु दंड विनिर्दिष्ट किया गया है) इस संहिता के अधीन अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान, उस विधि के अधीन उस अपराध के…
पूरा पढ़ेंविचाराधीन कैदी को अधिकतम कितने समय तक हिरासत में रखा जा सकता है।
(1) यदि कोई व्यक्ति किसी कानून के तहत किसी अपराध की इस संहिता के अंतर्गत जांच, पूछताछ या मुकदमे की अवधि के दौरान (ऐसा अपराध न हो जिसके लिए उस कानून के तहत मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान हो) उस कानून के तहत उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास अवधि के आधे तक की अवधि के लिए हिरासत में रहा हो, तो उसे न्यायालय…
पूरा पढ़ेंधारा 470. कतिपय दशाओं में समय का अपवर्जन
470. कतिपय दशाओं में समय का अपवर्जन (1) परिसीमा-काल की संगणना करने में, वह समय अपवर्जित किया जाएगा जिसके दौरान कोई व्यक्ति अपराधी के विरुद्ध अन्य अभियोजन का, चाहे प्रथम बार के न्यायालय में या अपील या पुनरीक्षण न्यायालय में, सम्यक् तत्परता से संचालन करता रहा है: परन्तु ऐसा कोई अपवर्जन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि वह…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में समय का अपवर्जन।
(1) परिसीमा अवधि की गणना करते समय, वह समय जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अपराधी के विरुद्ध प्रथम न्यायालय या अपील न्यायालय या पुनरीक्षण न्यायालय में किसी अन्य अभियोग को उचित तत्परता से चलाया हो, उसे बाहर रखा जाएगा: बशर्ते कि ऐसा कोई अपवर्जन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि अभियोग समान तथ्यों से संबंधित न हो और किसी ऐसे…
पूरा पढ़ेंधारा 471. उस दिन का अपवर्जन जिस दिन न्यायालय बंद है
471. उस दिन का अपवर्जन जिस दिन न्यायालय बंद है जहां परिसीमा-काल ऐसे दिन समाप्त होता है जब न्यायालय बंद है, वहां न्यायालय उस दिन संज्ञान कर सकेगा जिस दिन न्यायालय पुनः खुलता है। स्पष्टीकरण—इस धारा के अर्थ में न्यायालय किसी दिन बंद समझा जाएगा, यदि वह अपने सामान्य कार्य-घंटों के दौरान उस दिन बंद रहता है।
पूरा पढ़ेंन्यायालय के बंद रहने की तिथि को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।
यदि परिसीमा अवधि उस दिन समाप्त होती है जिस दिन न्यायालय बंद रहता है, तो न्यायालय उस दिन संज्ञान ले सकता है जिस दिन न्यायालय फिर से खुलता है। स्पष्टीकरण.--- इस धारा के अर्थ में किसी न्यायालय को उस दिन बंद माना जाएगा, यदि वह अपने सामान्य कार्य समय के दौरान उस दिन बंद रहता है।
पूरा पढ़ेंधारा 472. चालू अपराध
472. चालू अपराध चालू अपराध की दशा में, परिसीमा का नया काल उस समय के हर क्षण में प्रारंभ होगा जिसके दौरान अपराध चालू रहता है।
पूरा पढ़ेंनिरंतर अपराध।
किसी अपराध के जारी रहने की स्थिति में, अपराध के जारी रहने के प्रत्येक क्षण से परिसीमा की एक नई अवधि शुरू हो जाएगी।
पूरा पढ़ेंधारा 473. कतिपय दशाओं में परिसीमा-काल का बढ़ाया जाना
473. कतिपय दशाओं में परिसीमा-काल का बढ़ाया जाना इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी अपराध का संज्ञान परिसीमा-काल की समाप्ति के पश्चात् भी कर सकेगा, यदि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उसका यह समाधान हो जाता है कि विलंब का सम्यक् रूप से स्पष्टीकरण कर दिया गया है, अथवा यह कि…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में परिसीमा अवधि का विस्तार।
इस अध्याय के पूर्वगामी प्रावधानों में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय परिसीमा अवधि समाप्त होने के बाद किसी अपराध का संज्ञान ले सकता है, यदि वह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से संतुष्ट हो कि विलंब का उचित स्पष्टीकरण दिया गया है या न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है।
पूरा पढ़ेंधारा 474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण
474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण जब किसी अपराध का विचारण उच्च न्यायालय द्वारा धारा 407 के अधीन से अन्यथा किया जाता है, तब वह उस अपराध के विचारण में वही प्रक्रिया अवलंबित करेगा जो सेशन न्यायालय, यदि वह उस मामले का विचारण कर रहा होता तो, अवलंबित करता।
पूरा पढ़ेंउच्च न्यायालयों के समक्ष मुकदमे।
जब किसी अपराध की सुनवाई उच्च न्यायालय द्वारा धारा 447 के अलावा किसी अन्य तरीके से की जाती है, तो वह उस अपराध की सुनवाई में वही प्रक्रिया अपनाएगा जो सत्र न्यायालय उस मामले की सुनवाई करते समय अपनाता।
पूरा पढ़ेंधारा 475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान (1) केंद्रीय सरकार, इस संहिता तथा सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि से संगत नियम, उन मामलों के बारे में बना…
पूरा पढ़ेंजिन व्यक्तियों पर कोर्ट-मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है, उन्हें कमांडिंग अधिकारियों को सौंपना।
(1) केंद्र सरकार इस संहिता और वायु सेना अधिनियम, 1950 (45 ऑफ 1950), सेना अधिनियम, 1950 (46 ऑफ 1950), नौसेना अधिनियम, 1957 (62 ऑफ 1957), और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित किसी अन्य कानून के अनुरूप नियम बना सकती है, उन मामलों के संबंध में जिनमें सेना, नौसेना या वायु सेना कानून, या ऐसे अन्य कानून के अधीन व्यक्तियों पर इस…
पूरा पढ़ेंधारा 476. प्ररूप
476. प्ररूप संविधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त शक्ति के अधीन रहते हुए, द्वितीय अनुसूची में उपवर्णित प्ररूप, ऐसे फेरफारों सहित जो प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार अपेक्षित हों, उनमें वर्णित तत्संबंधी प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाए जा सकेंगे, और यदि उपयोग में लाए जाएं तो पर्याप्त होंगे।
पूरा पढ़ेंप्रपत्र।
संविधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त शक्ति के अधीन रहते हुए, द्वितीय अनुसूची में निर्धारित प्रपत्रों का उपयोग, प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक बदलावों के साथ, उसमें उल्लिखित संबंधित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, और यदि उनका उपयोग किया जाता है तो वे पर्याप्त होंगे।
पूरा पढ़ेंधारा 477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति (1) हर उच्च न्यायालय, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगा— (क) उन व्यक्तियों के बारे में जिन्हें अपने अधीनस्थ दंड न्यायालयों में अर्जीनवीस के रूप में कार्य करने की अनुज्ञा दी जा सकेगी; (ख) ऐसे व्यक्तियों को अनुज्ञप्तियां देने का, उनके द्वारा…
पूरा पढ़ेंनियम बनाने का उच्च न्यायालय का अधिकार।
(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से, नियम बना सकता है--- (क) उन व्यक्तियों के संबंध में जिन्हें इसके अधीनस्थ आपराधिक न्यायालयों में याचिका-लेखक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जा सकती है; (ख) ऐसे व्यक्तियों को लाइसेंस जारी करने, उनके द्वारा व्यवसाय के संचालन और उनके द्वारा लिए जाने वाले…
पूरा पढ़ेंधारा 478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति
478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति यदि किसी राज्य की विधान सभा संकल्प द्वारा ऐसी अनुज्ञा दे, तो राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि धारा 108, धारा 109, धारा 110, धारा 145 और धारा 147 में कार्यपालक मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सौंपे गए कार्यों में परिवर्तन करने का अधिकार।
यदि किसी राज्य की विधान सभा संकल्प द्वारा ऐसा करने की अनुमति देती है, तो राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करने के बाद अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकती है कि धारा 127, 128, 129, 164 और 166 में कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के संदर्भों को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के संदर्भों के रूप में समझा जाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है
479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, उस न्यायालय की अनुज्ञा के सिवाय जिसमें उसके न्यायालय से अपील होती है, किसी ऐसे मामले का विचारण नहीं करेगा या उसे विचारण के लिए सुपुर्द नहीं करेगा जिसमें वह पक्षकार है या वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है, और कोई न्यायाधीश या…
पूरा पढ़ेंऐसे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत रुचि हो।
कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, अपने न्यायालय से अपील किए जाने वाले न्यायालय की अनुमति के बिना, किसी ऐसे मामले की सुनवाई या परीक्षण के लिए सौंपने का कार्य नहीं करेगा जिसमें वह स्वयं पक्षकार हो या व्यक्तिगत रूप से हित रखता हो, और कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट अपने द्वारा पारित या दिए गए किसी भी निर्णय या आदेश के…
पूरा पढ़ें- CRPC §47BNSS §44
धारा 47. उस स्थान की तलाशी, जिसमें गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति घुसा हो
जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाना है, उसके द्वारा प्रवेश किए गए स्थान की तलाशी।
- CRPC §50BNSS §47
धारा 50. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की और जमानत के अधिकार की इत्तिला दिया जाना
गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों और जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाएगा।
- CRPC §430BNSS §470
धारा 430. दंडादेश के निष्पादन पर वारंट का लौटाया जाना
सजा के निष्पादन पर वारंट की वापसी।
- CRPC §431BNSS §471
धारा 431. संदाय के लिए आदिष्ट धन का जुर्माने के रूप में वसूलीय होना
जुर्माना के रूप में वसूली योग्य धनराशि का भुगतान करने का आदेश दिया गया है।
- CRPC §NEW SECTIONBNSS §472
नई धारा
मृत्युदंड के मामलों में दया याचिका।
CRPC §NEW SECTIONBNSS §472 - CRPC §432BNSS §473
धारा 432. दंडादेशों को निलंबित करने या उनका परिहार करने की शक्ति
सजा को निलंबित करने या माफ करने का अधिकार।
- CRPC §433BNSS §474
धारा 433. दंडादेश के लघुकरण की शक्ति
सजा कम करने का अधिकार।
- CRPC §433ABNSS §475
धारा 433A. कतिपय मामलों में परिहार या लघुकरण की शक्तियों पर निर्बंधन
कुछ मामलों में माफी या सजा कम करने की शक्तियों पर प्रतिबंध।
- CRPC §434BNSS §476
धारा 434. मृत्यु दंडादेशों की दशा में केंद्रीय सरकार की समवर्ती शक्ति
मृत्युदंड के मामलों में केंद्र सरकार की समवर्ती शक्तियां।
- CRPC §435BNSS §477
धारा 435. कुछ मामलों में राज्य सरकार का केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात् कार्य करना
कुछ मामलों में राज्य सरकार केंद्र सरकार की सहमति के बाद ही कार्रवाई करेगी।
- CRPC §436BNSS §478
धारा 436. किन मामलों में जमानत ली जाएगी
किन मामलों में जमानत ली जा सकती है?
- CRPC §436ABNSS §479
धारा 436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा
विचाराधीन कैदी को अधिकतम कितने समय तक हिरासत में रखा जा सकता है।
- CRPC §470BNSS §516
धारा 470. कतिपय दशाओं में समय का अपवर्जन
कुछ मामलों में समय का अपवर्जन।
- CRPC §471BNSS §517
धारा 471. उस दिन का अपवर्जन जिस दिन न्यायालय बंद है
न्यायालय के बंद रहने की तिथि को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।
- CRPC §472BNSS §518
धारा 472. चालू अपराध
निरंतर अपराध।
- CRPC §473BNSS §519
धारा 473. कतिपय दशाओं में परिसीमा-काल का बढ़ाया जाना
कुछ मामलों में परिसीमा अवधि का विस्तार।
- CRPC §474BNSS §520
धारा 474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण
उच्च न्यायालयों के समक्ष मुकदमे।
- CRPC §475BNSS §521
धारा 475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
जिन व्यक्तियों पर कोर्ट-मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है, उन्हें कमांडिंग अधिकारियों को सौंपना।
- CRPC §476BNSS §522
धारा 476. प्ररूप
प्रपत्र।
- CRPC §477BNSS §523
धारा 477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
नियम बनाने का उच्च न्यायालय का अधिकार।
- CRPC §478BNSS §524
धारा 478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति
कुछ मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सौंपे गए कार्यों में परिवर्तन करने का अधिकार।
- CRPC §479BNSS §525
धारा 479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है
ऐसे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत रुचि हो।

