सीआरपीसी → बीएनएसएस
22 प्रविष्टियाँ
धारा 21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट राज्य सरकार, ऐसी अवधि के लिए, जो वह ठीक समझे, विशिष्ट क्षेत्रों के लिए या विशिष्ट कृत्यों के पालन के लिए, कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी, जो विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के रूप में ज्ञात होंगे, और ऐसे विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को ऐसी शक्तियां प्रदान कर सकेगी, जो इस संहिता के अधीन…
पूरा पढ़ेंविशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
राज्य सरकार, उचित समझे जाने वाले कार्यकाल के लिए, कार्यवाहक मजिस्ट्रेट या पुलिस अधीक्षक या समकक्ष पद से कम रैंक के किसी पुलिस अधिकारी को विशेष कार्यवाहक मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त कर सकती है, जो विशिष्ट क्षेत्रों या विशिष्ट कार्यों के निष्पादन के लिए नियुक्त किए जाएंगे, और ऐसे विशेष कार्यवाहक मजिस्ट्रेटों को वे…
पूरा पढ़ेंधारा 26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं
26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं इस संहिता के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए,— (क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन किसी अपराध का विचारण— (i) उच्च न्यायालय, या (ii) सेशन न्यायालय, या (iii) ऐसे किसी अन्य न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा, जिसके द्वारा वह अपराध प्रथम अनुसूची में विचारणीय दिखाया गया है;…
पूरा पढ़ेंवे न्यायालय जिनके द्वारा अपराधों का मुकदमा चलाया जा सकता है।
इस संहिता के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए,— (क) भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत किसी भी अपराध का मुकदमा निम्नलिखित द्वारा चलाया जा सकता है— (i) उच्च न्यायालय; या (ii) सत्र न्यायालय; या (iii) कोई अन्य न्यायालय जिसके द्वारा प्रथम अनुसूची में ऐसे अपराध को विचारणीय दिखाया गया है: बशर्ते कि भारतीय न्याय संहिता,…
पूरा पढ़ेंधारा 190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान (1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, तथा उपधारा (2) के अधीन इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान कर सकेगा— (क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है; (ख) ऐसे…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान।
(1) इस अध्याय के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट और उपधारा (2) के अधीन इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान ले सकता है— (क) किसी विशेष कानून के तहत अधिकृत व्यक्ति द्वारा दायर की गई शिकायत सहित, तथ्यों की शिकायत प्राप्त होने पर, जो ऐसे अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण
191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण जब कोई मजिस्ट्रेट धारा 190 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान करता है, तब कोई साक्ष्य लिए जाने से पहले अभियुक्त को यह बताया जाएगा कि वह इस बात का हकदार है कि मामले की जांच या विचारण किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाए, और यदि अभियुक्त, या यदि एक से अधिक अभियुक्त हैं…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त के आवेदन पर स्थानांतरण।
जब कोई मजिस्ट्रेट धारा 210 की उपधारा (1) के खंड (ग) के तहत किसी अपराध का संज्ञान लेता है, तो साक्ष्य लेने से पहले आरोपी को सूचित किया जाएगा कि उसे किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की जांच या सुनवाई कराने का अधिकार है, और यदि आरोपी या एक से अधिक आरोपियों में से कोई भी संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की…
पूरा पढ़ेंधारा 192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना
192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना (1) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान करने के पश्चात्, मामले को जांच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट को सौंप सकेगा। (2) प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, किसी अपराध का संज्ञान…
पूरा पढ़ेंमामलों को मजिस्ट्रेटों को सौंपना।
(1) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद मामले को जांच या परीक्षण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट को सौंप सकता है। (2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में सशक्त किया गया प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद, मामले को जांच या परीक्षण के लिए ऐसे…
पूरा पढ़ेंधारा 193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान
193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, कोई सत्र न्यायालय आरंभिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा, जब तक कि मामला इस संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सुपुर्द न कर…
पूरा पढ़ेंसत्र न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान लेना।
जब तक इस संहिता या किसी अन्य कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अन्यथा प्रावधान न किया गया हो, कोई भी सत्र न्यायालय मूल क्षेत्राधिकार के न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक कि मामला इस संहिता के तहत किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सौंपा न गया हो।
पूरा पढ़ेंधारा 194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण
194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण अपर सत्र न्यायाधीश या सहायक सत्र न्यायाधीश ऐसे मामलों का विचारण करेगा, जो उस सत्र खंड का सत्र न्यायाधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा विचारण के लिए उसे सौंपे, या जिनका विचारण करने का निदेश उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा उसे दे।
पूरा पढ़ेंअतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को सौंपे गए मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त किया गया है।
एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ऐसे मामलों की सुनवाई करेगा जिन्हें संभागीय सत्र न्यायाधीश सामान्य या विशेष आदेश द्वारा उसे सुनवाई के लिए सौंप सकता है या जिन्हें उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा उसे सुनवाई करने का निर्देश दे सकता है।
पूरा पढ़ेंलोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा-- (क) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 172 से 188 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का, या (ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में, या (iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य…
पूरा पढ़ेंलोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा— (क) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 (दोनों सहित, लेकिन धारा 209 को छोड़कर) के तहत दंडनीय किसी अपराध का; या (ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में; या (iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, सिवाय इसके कि संबंधित…
पूरा पढ़ेंधारा 195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया
195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया कोई साक्षी या कोई अन्य व्यक्ति भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 195क के अधीन किसी अपराध के संबंध में परिवाद फाइल कर सकेगा।
पूरा पढ़ेंधमकी आदि के मामलों में गवाहों के लिए प्रक्रिया।
कोई गवाह या कोई अन्य व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 232 के तहत किसी अपराध के संबंध में शिकायत दर्ज करा सकता है।
पूरा पढ़ेंधारा 196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन
196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय— (क) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 6 के अधीन, या धारा 153क, धारा 295क या धारा 505 की उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, या (ख) ऐसा अपराध करने के किसी आपराधिक षड्यंत्र का, या (ग) ऐसे किसी…
पूरा पढ़ेंराज्य के विरुद्ध अपराधों और ऐसे अपराध करने की आपराधिक साजिश के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय निम्नलिखित मामलों का संज्ञान नहीं लेगा— (क) भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय सात या धारा 196, धारा 299 या धारा 353 की उपधारा (1) के तहत दंडनीय कोई अपराध; या (ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र; या (ग) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 47 में वर्णित किसी भी प्रकार का उकसाना, केंद्र सरकार या…
पूरा पढ़ेंधारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन (1) जब कोई व्यक्ति, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट है या रह चुका है, या ऐसा लोक सेवक है, जो सरकार द्वारा या सरकार की मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते…
पूरा पढ़ेंन्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
(1) जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या रहा है, जिसे सरकार की स्वीकृति के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए किया हो, तो कोई भी न्यायालय लोकपाल और लोकायुक्त…
पूरा पढ़ेंधारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 20 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु— (क) जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या पागल है, या रुग्णता अथवा…
पूरा पढ़ेंवैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से 84 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: उसे उपलब्ध कराया- (क) जहाँ ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता के कारण उच्च स्तर की सहायता की…
पूरा पढ़ेंधारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया (1) जब पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित किसी मामले में (जिसे इसमें इसके पश्चात् परिवाद-मामला कहा गया है) मजिस्ट्रेट को अपने द्वारा की जा रही जांच या विचारण के दौरान यह प्रतीत कराया जाता है कि उस अपराध के संबंध में,…
पूरा पढ़ेंकिसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
(1) जब किसी ऐसे मामले में, जो पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किया गया हो (जिसे इसके बाद शिकायत मामला कहा जाएगा), मजिस्ट्रेट को उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे के दौरान यह प्रतीत हो कि पुलिस द्वारा उस अपराध के संबंध में जांच चल रही है जो उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे का विषय है, तो मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
211. आरोप की अंतर्वस्तु (1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में वह अपराध कथित किया जाएगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है। (2) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया है, तो आरोप में उस अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा। (3) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई…
पूरा पढ़ेंआरोप की सामग्री।
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का उल्लेख होगा जिसके लिए अभियुक्त पर आरोप लगाया गया है। (2) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम देता है, तो अपराध को आरोप में केवल उसी नाम से वर्णित किया जा सकता है। (3) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम नहीं देता है, तो अपराध की…
पूरा पढ़ेंधारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां (1) आरोप में अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके विरुद्ध, या उस वस्तु (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी जो अभियुक्त को उस बात की सूचना देने के लिए,…
पूरा पढ़ेंसमय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
(1) आरोप पत्र में कथित अपराध के समय और स्थान तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) जिसके विरुद्ध या उस वस्तु (यदि कोई हो) जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, के बारे में ऐसे विवरण शामिल होंगे जो आरोपी को उस मामले की सूचना देने के लिए यथोचित रूप से पर्याप्त हों जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है। (2) जब अभियुक्त पर आपराधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए जब मामले की प्रकृति ऐसी है कि धारा 211 और धारा 212 में वर्णित विशिष्टियां अभियुक्त को उस बात की पर्याप्त सूचना नहीं देतीं जिसका उस पर आरोप है, तब आरोप में उस रीति की, जिससे अभिकथित अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां भी अंतर्विष्ट होंगी जो उस प्रयोजन के लिए पर्याप्त…
पूरा पढ़ेंअपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
जब मामले की प्रकृति ऐसी हो कि धारा 234 और 235 में उल्लिखित विवरण अभियुक्त को उस मामले की पर्याप्त सूचना न दें जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है, तो आरोप पत्र में कथित अपराध को अंजाम देने के तरीके के ऐसे विवरण भी शामिल होंगे जो उस उद्देश्य के लिए पर्याप्त होंगे। चित्र। (क) ए पर किसी निश्चित समय और स्थान पर किसी निश्चित…
पूरा पढ़ेंधारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है प्रत्येक आरोप में किसी अपराध का वर्णन करने में प्रयुक्त शब्द उस अर्थ में प्रयुक्त हुए समझे जाएंगे जो उन्हें उस विधि द्वारा क्रमशः दिया गया है जिसके अधीन ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंयहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
प्रत्येक आरोप में, अपराध का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त शब्दों को उस कानून द्वारा निर्धारित अर्थ में प्रयुक्त माना जाएगा जिसके तहत ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंधारा 215. गलतियों का प्रभाव
215. गलतियों का प्रभाव अपराध को या उन विशिष्टियों को, जिनका आरोप में कथित किया जाना अपेक्षित है, कथित करने में कोई गलती, और अपराध या उन विशिष्टियों को कथित करने का कोई लोप, मामले के किसी भी प्रक्रम में तात्विक न समझा जाएगा, जब तक कि अभियुक्त वस्तुतः ऐसी गलती या लोप से भ्रमित न हो गया हो और उससे न्याय की विफलता न हो गई…
पूरा पढ़ेंत्रुटियों का प्रभाव।
अपराध या आरोप में बताए जाने वाले विवरणों को बताने में कोई त्रुटि, या अपराध या उन विवरणों को बताने में कोई चूक, मामले के किसी भी चरण में महत्वपूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक कि आरोपी वास्तव में ऐसी त्रुटि या चूक से गुमराह न हुआ हो और इसके कारण न्याय में विफलता न हुई हो। चित्र। (क) ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा…
पूरा पढ़ेंधारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा (1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी भी समय किसी आरोप को परिवर्तित कर सकेगा या उसमें परिवर्धन कर सकेगा। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा। (3) यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण…
पूरा पढ़ेंन्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
(1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय किसी आरोप में परिवर्तन या जोड़ कर सकता है। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर समझाया जाएगा। (3) यदि किसी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन इस प्रकार का हो कि न्यायालय की राय में मुकदमे की कार्यवाही तुरंत शुरू करने से अभियुक्त को उसके बचाव में या…
पूरा पढ़ेंधारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना जब कभी विचारण के प्रारंभ के पश्चात् न्यायालय द्वारा कोई आरोप परिवर्तित किया जाता है या उसमें परिवर्धन किया जाता है, तब अभियोजक को और अभियुक्त को यह अनुज्ञात होगा कि वे— (क) किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी हो, पुनः बुलाएं या पुनः समन करें और ऐसे…
पूरा पढ़ेंआरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
जब भी मुकदमे की शुरुआत के बाद न्यायालय द्वारा आरोप में परिवर्तन या कोई आरोप जोड़ा जाता है, तो अभियोजक और आरोपी को इसकी अनुमति दी जाएगी— (क) किसी भी गवाह को, जिसकी पहले जांच की जा चुकी हो, वापस बुलाना या पुनः तलब करना और ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के संबंध में उसकी जांच करना, जब तक कि न्यायालय, लिखित रूप में दर्ज किए…
पूरा पढ़ेंधारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप (1) प्रत्येक पृथक् अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विचारण पृथक्तः किया जाएगा: परन्तु जहां अभियुक्त व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसी वांछा करता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है कि ऐसे व्यक्ति पर उससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना…
पूरा पढ़ेंअलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
(1) प्रत्येक पृथक अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, एक अलग आरोप होगा, और ऐसे प्रत्येक आरोप की सुनवाई अलग से की जाएगी: बशर्ते कि यदि आरोपी व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि इससे उस व्यक्ति को कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के…
पूरा पढ़ेंधारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा (1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के एक से अधिक अपराधों का, जो ऐसे अपराधों में से प्रथम से अंतिम तक बारह मास की कालावधि के भीतर किए गए हैं, अभियोग है, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में हों या नहीं, तब उस पर उनमें से किसी भी संख्या के…
पूरा पढ़ेंएक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।
(1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही प्रकार के एक से अधिक अपराधों का आरोप लगाया जाता है, जो पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह महीनों के अंतराल में किए गए हों, चाहे वे अपराध एक ही व्यक्ति के संबंध में हों या नहीं, तो उस पर अधिकतम पाँच अपराधों के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में उन अपराधों के लिए मुकदमा चलाया…
पूरा पढ़ें- CRPC §21BNSS §15
धारा 21. विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
- CRPC §26BNSS §21
धारा 26. वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराध विचारणीय हैं
वे न्यायालय जिनके द्वारा अपराधों का मुकदमा चलाया जा सकता है।
- CRPC §190BNSS §210
धारा 190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान।
- CRPC §191BNSS §211
धारा 191. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण
अभियुक्त के आवेदन पर स्थानांतरण।
- CRPC §192BNSS §212
धारा 192. मजिस्ट्रेटों को मामलों का सौंपा जाना
मामलों को मजिस्ट्रेटों को सौंपना।
- CRPC §193BNSS §213
धारा 193. सत्र न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान
सत्र न्यायालय द्वारा अपराधों का संज्ञान लेना।
- CRPC §194BNSS §214
धारा 194. अपर और सहायक सत्र न्यायाधीशों द्वारा उन्हें सौंपे गए मामलों का विचारण
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को सौंपे गए मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त किया गया है।
- CRPC §195BNSS §215
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
- CRPC §195ABNSS §216
धारा 195A. धमकी आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया
धमकी आदि के मामलों में गवाहों के लिए प्रक्रिया।
- CRPC §196BNSS §217
धारा 196. राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसा अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन
राज्य के विरुद्ध अपराधों और ऐसे अपराध करने की आपराधिक साजिश के लिए अभियोजन।
- CRPC §197BNSS §218
धारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
- CRPC §198BNSS §219
धारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
वैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
- CRPC §210BNSS §233
धारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
किसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
- CRPC §211BNSS §234
धारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
आरोप की सामग्री।
- CRPC §212BNSS §235
धारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
समय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
- CRPC §213BNSS §236
धारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
अपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
- CRPC §214BNSS §237
धारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
यहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
- CRPC §215BNSS §238
धारा 215. गलतियों का प्रभाव
त्रुटियों का प्रभाव।
- CRPC §216BNSS §239
धारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
न्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
- CRPC §217BNSS §240
धारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
आरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
- CRPC §218BNSS §241
धारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
- CRPC §219BNSS §242
धारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
एक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।

